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गोपी गीत
‘क्वाऽहं तमोमहदहंखचराग्निवार्भूसंवेष्टिताण्डघटसप्तवितस्तिकायः।
क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्डपराणुचर्यावाताध्वरोम विवरस्य च ते महित्वम्।’
अर्थात्, कहाँ मैं साढ़े तीन हाथ ब्रह्माण्ड घट की महिमा में अभिमान करने वाला और कहाँ आप जिसके रोम-रोम में कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड व्याप्त हैं। जैसे वातायन से आती हुई सूर्य-रश्मि के अन्तर्गत अत्यन्त सूक्ष्म रेणु परिलक्षित होती है वैसे ही आपके प्रत्येक रोमकूप में परमाणु-तुल्य अनन्त ब्रह्माण्ड परिव्याप्त है; प्रत्येक ब्रह्माण्ड अपने परिमाण से ‘सप्त-वितस्ति-काय’ साढे़ तीन हाथ है; प्रत्येक ब्रह्माण्ड अष्टावरण-समावृत है। प्रकृति-तत्त्व, महत्-तत्त्व, अहं, ख-आकाश, चर-वायु, तेज-अग्नि, जल एवं भू-पृथ्वी ही अष्टावरण हैं। कहीं-कहीं सप्तावरण भी मान्य हैं; सप्तावरण को मानने वाले प्रकृति-तत्त्व को आवरण के अन्तर्गत नहीं मानते। ‘रामचरित-मानस’ में काकभुशुण्डिजी जहाँ-जहाँ गए वहीं-वहीं उनको राघवेन्द्र रामचन्द्र की भुजा पीछा करती हुई दीखी। प्रत्येक ब्रह्माण्ड अष्टावरण समावृत है; प्रत्येक ब्रह्माण्डान्तर्गत प्रत्येक वस्तु अष्टावरण-समावृत है; इस प्रकार के अपरिगणित ब्रह्माण्ड का परिभ्रमण आपके एक-एक रोम में हो रहा है।
‘देखरावा मातहि निजहि अद्भुत रूप अखंड।
रोम-रोम प्रति लागे कोटि-कोटि ब्रह्मण्ड।’
प्रत्येक ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा विशिष्ट होते हैं; किसी ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा चतुर्मुख हैं तो अन्य ब्रह्माण्ड में अष्टमुख, द्वादशमुख, षोडशमुख भी हैं। पुराणों में एक रोचक कथा है; किसी ब्रह्मा को वैराग्य हो गया अतः उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के यहाँ अपना मुक्ति-नामा पेश कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने उनको समझाया-बुझाया, परन्तु ब्रह्मा ने उनकी एक भी बात न मानी और अपना त्यागपत्र देकर आ गये। लौटते हुए रास्ते में ब्रह्माजी ने देखा कि असंख्यात ऊँटों की कतार चली आ रही है; उत्सुक होकर ब्रह्मा उन लोगों से पूछताछ करने लगे; मालूम हुआ कि प्रत्येक ऊँट पर दो-दो पेटियाँ हैं; प्रत्येक पेटी में दस-दस ब्रह्मा हैं जो भगवान श्रीकृष्ण के यहाँ भेजे जा रहे हैं; उनको जो पसन्द होगा उसको वे रख लेंगे, शेष लौट आयेंगे। तो ब्रह्माजी स्तम्भित हो गए और कहने लगे, ‘भाई, तुम लौट जाओ; मैं ही त्याग-पत्र देकर आया था परन्तु अब मैं अपने कार्य-भार को पुनः सँभाल लेता हूँ।’
इसी तरह, वृन्दावन-धाम, गोकुल-धाम में ब्रह्मा को विष्णु-स्वरूप परिलक्षित हुआ। आनन्दकन्द-परमानन्द श्रीकृष्णचन्द्र ही प्रत्येक गोप-बालक, धेनु, गोवत्स एवं उनके वसन-अलंकारादि सम्पूर्ण विभिन्न स्वरूपों में प्रकट हुए; उन सब विभिन्न स्वरूपों के सम्मुख चौबीसों तत्त्वों को मूर्तिमान् हो स्तुति करते हुए ब्रह्मा दे देखा। अव्यक्त, महत्, अहम्, पंचतन्मात्रा एवं षोडश विकार ही चौबीस तत्त्व हैं। शंकराचार्यजी कह रहे हैं, जिस विष्णु के चरणोदकरूप गंगा को भूत-भावन भगवान विश्वनाथ भी निरन्तर अपने मस्तक पर धारण करते हैं वही दशम-स्कन्ध का वर्णनीय दशम-तत्त्व, सच्चिन्मयी नीलिमा, श्याम-तेज, श्रीकृष्णरूप में अवतरित है। ‘भवन्तमेव मृगयन्ति सन्तः’ विज्ञ-जन असत् का परित्याग करते हुए आपका ही अनुसन्धान करते हैं। ‘न च पुनरावर्तते’ इस सत् को, इस दशम-तत्त्व को जान लेने पर पुनरावृत्ति, पुनर्जन्म नहीं होता।
मन्त्र-ब्रह्मणात्मक वेद, श्रुतियों की अधिष्ठात्री देवियाँ ही गोप-कन्याओं के रूप में आविर्भूत हुईं; भगवत-सम्मिलन, भगवत-स्वरूप-सम्भोग-सुखहेतु-विह्वला ही श्रुतियाँ प्रार्थना कर रही हैं। ‘शरदुदाशये, स्वच्छ जलाशयसदृशे अन्तःकरणे; उदाशयो जलाशयः।’ शरत्कालीन पद-प्रयोग से स्वच्छता अभिप्रेत है। तात्पर्य कि शरत्कालीन अगाध स्वच्छ जलाशय स्वरूप साधक के निर्दोष शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु, श्रद्धावान्, समाहित अन्तःकरण में ही आपका स्म्यक् दर्शन सम्भव है। कथंचित् तो सर्वत्र ही भगवत-दर्शन हो जाता है, तथापि वह दर्शन फलपर्यवसायी नहीं होता। जैसे मेघाच्छन्न सूर्य ही आच्छादक मेघ का अवभासक भी है वैसे ही अज्ञानान्छन्न-चित्त ही ज्ञान का द्योतक भी है। जैसे सम्यक् प्रकाश होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही सम्यक्-ज्ञान उत्पन्न होते ही अज्ञान नष्ट हो जाता है। ‘अविचारितरमणीयं जगत’ अर्थात् अविचार के कारण ही जगत रमणीय प्रतीत होता है। ‘अज्ञानभासकत्वेन, अहंकार भासकत्वेन अहं शान्तः अहं मूढः, अहं घोरः आदि’ विभिन्न प्रकारों से अहं का प्रकाश जिसमें होता है वह वस्तु अन्तःकरण में ही सतत प्रकाशित है।
‘शरदुदाशये’ शरत्कालीन स्वच्छ जलाशय सदृश शान्त उपरत तितिक्षु समाहित श्रद्धान्वित चित्त में ही ‘दृशा दर्शनेन भगवद्दर्शनेन’ भगवद्-दर्शन एवं साक्षातकार से अन्तःकरण की विषयाकाराकारित वृत्तियाँ तथा अनिर्वचनीय अज्ञान दोनों का बाधन कर लेने वाले विज्ञ साधक का जगत में पतन अथवा बन्धन नही होता। अज्ञान एवं प्रपन्च का स्फुरण ही बन्धनकारक है। कारणभूत अज्ञान, सुषुप्ति स्वप्न एवं जाग्रत् तीनों ही अवस्थाओं में अनुभूत होते हुए भी निद्राकाल में ही सर्वाधिक अनुभूयमान होता है तथा अन्तःकरण की विषयाकाराकारित वृत्तियाँ जाग्रत्-काल में ही सर्वाधिक प्रखर होती हैं। विषयाकाराकारित वृत्तियो का स्फुरण ही जगत है। अधिष्ठानस्वरूप परमात्मा के विज्ञान में जब प्रपन्चबुद्धि बाधित हो जाती है तब उपादानता एवं निमित्तता परमात्मा में ही बाधित हो जाती है; इस स्थिति में कार्य-कारणातीत शुद्धस्वरूप की अभिव्यक्ति है।
‘विषं विषान्तरं जरयति स्वयमपि जीर्यति।’
जैसे एक विष अन्य विष का प्रशमन कर स्वयं भी शान्त हो जाता है, अथवा दुग्ध दूसरे दुग्ध को शान्त करके स्वयं भी जीर्ण हो जाता है किंवा जैसे कतक-रेणु (निर्मली बूटी) जल की मलिनता को लेकर स्वयं भी नीचे बैठ जाती है ऐसे ही माहावाक्यजन्य ब्रह्माकाराकारित वृत्ति इतर सम्पूर्ण विषय-विषयिणी वृत्तियों को समाप्त कर स्वयं भी जीर्ण हो जाती है। अस्तु, जो विज्ञ भगवत-साक्षातकार से अज्ञान एवं अज्ञानजन्य विभिन्न वृत्तियों को बाधित कर स्थिर हो जाता है उसका ‘संसारे वधो न भवति’ संसार में वध नहीं होता है; विनाश्ज्ञ के हेतु अज्ञान के समाप्त हो जाने पर विनाश असम्भव हो जाता है। ‘सरसिज’ का अर्थ ‘अज्ञान’ भी है; कहीं-कहीं सरस शब्द का प्रयोग ब्रह्म में किया गया है। उदाहरणतः ‘यदालोक्याह्लादं हद इव निमज्ज्यामृतमये’ अर्थात् जैसे कोई प्राणी अमृत के हद में निमज्जन करके आनन्द का अनुभव करते हैं। अस्तु सरसिजं का अर्थ हुआ ‘ब्रह्मणि-जातम्।’
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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