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गोपी गीत
‘साधुजात’ अर्थात जिसकी उत्पत्ति का सम्यक् विवेचन सम्भव हो एवं जिसमें कार्य-कारण की सुव्यवस्था हो। इस पद में बहुव्रीहि समास मान लेने पर इसका अर्थ होगा अनिर्वचनीयोत्पत्तिमत्। जैसे आनन्द चैतन्यात्मक ब्रह्म से दुःखात्मक तथा जड़ प्रपंच का आविर्भाव सम्भव है वैसे ही परमार्थ सत्य परमात्मा से मिथ्या प्रपंच का प्रादुर्भाव मानना युक्त है। अस्तु, परमानन्द स्वप्रकाश, परमार्थ-सत्य भगवान से ही दुःखात्मक, जड़ात्मक मिथ्या, अर्थात् अपारमार्थिक, व्यवहारोपयोगी, व्यावहारिक प्रपंच का प्रादुर्भाव होता है; जगत का मूल अज्ञान है, स्वप्रकाश चित् अखण्ड बोध से भिन्न, चिदभिन्न अचित ही अज्ञान है। जैसे अग्नि को दाहिका शक्ति किंवा बीज की अंकुरोत्पादिनी शक्ति अग्नि अथवा बीज से विलक्षण होती है वैसे ही त्रिकालाबाध्य सद्रूप ब्रह्म की प्रपंचोत्पादिनी शक्ति भी उससे विलक्षण एवं अनादि है; त्रिकालाबाध्य रूप सत् से विलक्षण उसकी शक्ति शुद्ध सद्रूप अधिष्ठान के बोध से बाधित हो जाती है परन्तु ब्रह्म-तत्त्व कदापि बाधित नहीं होता। ‘भेदोभेद्यं भिन्नत्ति, स्वमपि भिन्नति’ जैसे भेद अन्य भेदों को भिन्न करता है वैसे ही स्वयं को भी भिन्न कर लेता है। नैयायिकों का मत है, ‘ज्ञेयं जानाति स्वमपि जानाति।’ आत्मा ज्ञेय को भी जानता है, अपने को भी जानता है। ‘अज्ञानं जगत कल्पनाबीजम्’ भवति, स्वकल्पनाबीजमपि भवति’ अज्ञान ही जगत एवं स्वकल्पना का भी कारण होता है। एतावता परमात्मनिष्ठ वह शक्ति जिससे परमात्मा स्वयं को सरल प्रपन्चरूप से व्यक्त करता है सत् एवं असत् दोनों से विलक्षण होने के कारण अनिर्वचनीय है; ‘अनिर्वचनीयोत्पत्तिमत्’ यही साधुजात जगत है।
‘सत् सरसिजम्’ अर्थात् जो सरसिज सत् है, जो अभावरूप नहीं है; नैयायिक सिद्धान्तानुसार अज्ञान ज्ञानाभावरूप है। ‘अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः’ ज्ञान-स्वरूप ब्रह्म अज्ञान से आच्छादित है। ज्ञानाभावरूप अज्ञान में आवरण-कर्तृत्व नहीं हो सकता; भावाभाव के असमकालिक होने से ज्ञान से ज्ञानाभावरूप अज्ञान का नाश भी नहीं हो सकता अतः अज्ञान सदसद्विलक्षण माया शक्तिरूप ही है। ‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः’ इत्यादि वचनों से माया द्वारा ज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्म का आवरण कहा गया है। एतावता योगमाया एवं अज्ञान दोनों ही आवरण होने के कारण अचित् हैं। स्वप्रकाश अखण्डबोध चैतन्य से भिन्न ही अचित् अथवा अज्ञान है।
शक्ति एवं शक्तिमान् में वस्तुतः अभेद होते हुए किंचित् मात्र भिन्नता है अतः ‘सत् सरसिजं’-कहा-अर्थात्, जो सत् है, जो अभावरूप नहीं है, साथ ही, ‘साधुजातसत्सरसिजं अनिर्वचनीयोत्पत्तिमत् अज्ञानं तदेव आभासमानं’ अनिर्वचनीय है उत्पत्ति जिसकी ऐसा अज्ञानवत् प्रतीत होता है वह अनिर्वचनीय अज्ञान सरसिज ब्रह्म में हरने वाला अज्ञान। साधुजात सत्सरसिज और उसके उदर में रहनेवाली श्री ‘उभयमपि मुष्णाति इति श्रीमुट् अर्थात् साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुट्तया श्रीमुषा’ अर्थात् अनादि अनिर्वचनीय अज्ञान और अनादि अज्ञान के उदर में रहने वाली श्री, वह श्री भगवद्-दर्शन से बाधित हो गई। तात्पर्य कि भगवत-स्वरूप-साक्षातकार होने पर सात्त्विक-असात्त्विक, अनुकूल-प्रतिकूल, राजस-तामस, ग्राह्याग्राह्य, यहाँ तक कि ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्यादि सम्पूर्ण सदसद् वृत्तियाँ भी बाधित हो जाती हैं और एक अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश भगवान ही अवशिष्ट रह जाते हैं।
‘न च पुनरावर्त्तते न च पनुरावर्त्तते’ ‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ आदि श्रुतियाँ व्रज-सीमन्तिनी, गोपांगना स्वरूप में तत्त्व-विवेचन करती हुई कह रही हैं, हे पूर्णतम! पुरुषोत्तम! हे सुरतनाथ! सर्व प्रकार के याचित, कामित पदार्थों को प्रदान करने वाले हे वरद! सर्व प्रकार के अभीष्टदाता, हे सर्वेश्वर! हे सर्व-प्राणिपरम-प्रेमास्पद! आपके दर्शन से अपरोक्ष साक्षातकार से अनादि अनिर्वचनीय अज्ञान और तत् तत् विषयाकाराकारित वृत्तियाँ दोनों का ही हनन कर देने वाले, बाध कर देने वाले विद्वान् का इस संसार में हनन बाध नहीं होता। अज्ञान साधुजात सत् है, अनिर्वचनीय उत्पत्तिवान् है। ‘सरसिजं’ यह अज्ञान ब्रह्म हद से उद्भूत है, ‘शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दशा।’ अज्ञान एवं अज्ञान के कार्यरूप उसकी श्री, दोनों का ही आपके ‘दृशा’ दर्शन से समूल उन्मूलन हो जाता है। अपरोक्ष भगवत-साक्षातकार से अनादि, अनिर्वचनीय अज्ञान एवं तज्जन्य विषयाकाराकारित वृत्तियों के बाधित हो जाने पर अखण्ड अनन्त निर्विकार परात्पर परब्रह्म ही प्रतिष्ठित हो जाता है फलतः सम्पूर्ण दुःखजाल का अन्त हो जाता है। अतः हे सुरतनाथ! हे वरद! शरद्कालीन स्वच्छ अगाध जलाशय सदृश हमारे अन्तःकरण में आपका अपरोक्ष साक्षातकार हो; आपके दर्शनमात्र से हमारा अज्ञान एवं तज्जन्य विषयाकाराकारित वृत्तियों का बाध हो जायगा। फलतः हमारे सम्पूर्ण दुःख समूल उन्मूलित हो जायेंगे।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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