Tuesday, 5 February 2019

55

55-
गोपी गीत

तृतीय श्लोक-

विषजलाप्ययाद् व्यालराक्षसाद् वर्षमारुताद् वैद्युतानलात्।
वृषमयात्मजाद् विश्वतोभयाद् ऋषभ ते वयं रक्षिता मुहुः॥3॥

अर्थात हे ऋषभ! विष-संपृक्त यमुनाजल, अघासुर, इन्द्रकोप-जन्य भयंकर वर्षा, दावानल, वृषभासुर, व्योमासुर आदि अनेकानेक संकटों से आपने बारम्बार हमारी रक्षा की है।

व्रजांगनाएँ कह रही हैं कि हे सर्वेश्वर! ‘विषवृक्षोऽपि सम्वध्र्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम्’ विषवृक्ष को लगाकर उसका भी उच्छेदन कोई स्वतः ही नहीं करता; हे व्रजेन्द्रनन्दन! आपने तो समय-समय पर विविध भयंकर उपद्रवों से रक्षण कर हमारा पालन ही किया है तथापि अब अपने अदर्शन को कारण बनाकर हमारा विनाश ही कर रहे हैं।
‘विषजलाप्यपाद् वयं रक्षिताः, विषजलेन यः अप्ययस्तस्माद् वयं रक्षिताः’ हे श्रीकृष्ण! जिस समय यमुना-जल के अन्तर्गत कालिय-हद के अत्यन्त विषमय जल का पान कर गोप-बालक अपने गोधन सहित मृत्यु को प्राप्त हुए तथा इस संताप से संपूर्ण व्रज ही नष्टप्राय हो रहा था उस समय आपने अपनी मंगलमयी अमृत-वर्षिणी कृपा-दृष्टि से ग्वाल-बाल-मंडली एवं उनके गाय-बछड़ों को जीवन दान देकर सम्पूर्ण व्रजधाम को ही जीवन प्रदान किया, उनकी रक्षा की।
‘व्यालराक्षसाद्’ अघासुर ने भयंकर विषधर अजगर का विशालकाय रूप धारण किया; इस विशालकाय विषधर ने अपना एक जबड़ा आकाश से और दूसरा पृथ्वी से सटा दिया; अपनी जिह्वा को इस तरह फैला दिया मानों कोई अत्यन्त प्रशस्त राजमार्ग हो; अजगर की बड़ी-बड़ी दष्ट्राएँ राजमार्ग के दोनो तरफ छोटी-छोटी पर्वत-श्रेणी-सी प्रती होती थीं। ग्वाल-बाल भ्रमवश उस मार्ग पर चल पड़े; उस पथ पर चलते हुए ग्वाल-बाल-मण्डली कल्पना कर रही है कि इस लाल-लाल मार्ग पर दोनों तरफ फैली हुई पहाड़ियाँ किसी अजगर की जिह्वा एवं विकराल दंष्ट्रावलि की तरह प्रतीत हो रही हैं; इस घाटी में जो दुर्गंधयुक्त गर्म वायु बह रही है वही मानो अजगर के उदर से आती हुई दुर्गन्धयुक्त श्वास है; बाल-मण्डली विचार भी कर रही है कि कहीं हमारी कल्पना ही सत्य हो जाय तो भी हम तो निश्चति ही हैं; निश्चय ही भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बकासुर की तरह ही इसका भी विनाश हो जायेगा।

अस्तु, सर्वथा निश्चति हो वह हँसती-खेलती बाल-मण्डली उस मार्गरूप जिह्वा पर निर्भय हो चल पड़ी। अजगर में यह विशेष चमत्कार होता है कि अपने श्वास के आकर्षण से ही वह अपना आहार खींच लेता है; स्वेच्छया प्रवृत्त इस बालक-मण्डली को भी अजगर ने अपनी श्वास द्वारा पूर्णतः आकर्षित कर निगल लिया। अघासुर के उदर में पहुँचकर ग्वाल-बाल उसकी भीषण विष-संपृक्त-जठराग्नि से दग्ध होने लगे। इस विपत्ति में पड़कर वे रक्षा हेतु प्रार्थना करने लगे। ‘अनन्यनाथान् सुरक्षयामि’ इन अनन्य-नाथ ग्वाल-बालों की रक्षा करूँगा ऐसा संकल्प कर बालक श्रीकृष्ण भी उस काल-राक्षस के उदर में घुस गए और अपनी महिमा सिद्धि शक्ति द्वारा अपने आकार की अतिशय वृद्धि करते हुए अघासुर के पेट को फाड़कर ग्वाल-बाल एवं उनके गोधन को मुक्त कर अपनी अमृत-वर्षिणी दृष्टि द्वारा उनको प्राणदान दिया।

अघ, पाप ही असुर है। जैसे अजगर द्वारा लील लिए जाने पर उस ग्वाल-मण्डली के जीवन की कोई आशा नहीं रह गई वैसे ही पापरूपी अजगर के फंदे में फँसने पर प्राणी के कल्याण की कोई आशा शेष नहीं रह जाती। जैसे अघासुर के पेट में फँसे हुए ग्वाल-गबाल उसकी भीषण विष-स्मपृक्त-जठराग्नि से दग्ध होने लगे वैसे ही पापरूप अजगर के फँदे में फँसा हुआ प्राणी भी दुष्कर्मजन्य विषयज्वाला से दग्ध होता रहता है। पाप-कर्म द्वारा तदनुकूल प्रवृत्ति एवं तज्जन्य संस्कार बनते जाते हैं; दूषित प्रवृत्ति एवं संस्कारों के कारण पुनः पाप-कर्म बन जाता है। अन्योन्याश्रित घटीवत् यह प्रवाह उत्तरोत्तर अभ्यासरूप में परिणत हो जाता है। जैसे ‘कण्टकेन कण्टकोद्धारः’ एक काँटे से दूसरा काँटा निकाला जाता है वैसे ही एक अभ्यास से दूसरे अभ्यास को मिटाया जा सकता है। सत्कर्म एवं प्रभु-चिन्तन का अभ्यास करने पर असत् कर्म। एवं दुर्विचार की श्रृंखला स्वतः नष्ट हो जाती है। अस्तु, सत्संग, सत्कर्म एवं सद्वाणी का अभ्यास निरन्तर करना चाहिए।

‘वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते।’

अर्थात तत्त्वविद्-जन उसको ही तत्त्व कहते हैं जो कि अद्वितीय ज्ञान है; स्वप्रकाश, अखण्ड, अनन्त जो ज्ञान है वही तत्त्व है। सम्पूर्ण वस्तु का बोध हो जाने पर जो अन्त में अवशिष्ट रह जाता है वह सर्वशेषी तत्त्व ही ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान आदि शब्दों से कहा जाता है। निराकार, निर्विकार, अद्वैत, अनन्त, अखण्ड, पूर्णसत्ता, परब्रह्म शब्द से अनन्त ब्रह्माण्ड का उत्पादक, पालक, संहारक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर, परमात्मा शब्द से तथा अनन्त कल्याण गुण-गणों से विशिष्ट, अनन्त, सौन्दर्य माधुर्य सौरस्य, सौगन्ध्यादि गुणों से युक्त तत्त्व ही भगवान शब्द से व्यपदिष्ट है। अद्वितीय जो ज्ञान है वही तत्त्व है इस श्रुति से परब्रह्म का प्रतिपादन होता है। ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद्ब्रह्मेति।’

अर्थात जिसमें अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, स्थिति एवं विलय होता है वहाँ परात्पर ब्रह्म है। ‘यः सर्वज्ञः सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः।’[2] अर्थात् जो सर्वज्ञ, सामान्येन-सर्व-पदार्थ-ज्ञाता है वह सर्ववित् अर्थात् सर्वविशेषज्ञ है; यही ईश्वर का स्वरूप है। ‘ईशावास्य; ईष्टे अति ईशः, ईश्वरः।’ जो ईशन-कर्ता, नियन्त्रण, शासन-कर्ता है वही ईश्वर है। ईश शब्द का वाच्यार्थ है नियन्त्रण कर्ता, शासन-कर्ता परन्तु लक्ष्यार्थ शुद्ध स्वप्रकाश, अशेषविशेषातीत, निर्विशेष परात्पर ब्रह्म ही है। ‘ईशावास्यं’ अर्थात् ईश्वर के द्वारा सम्पूर्ण विश्व का व्यसन, आच्छादन हो; जिस प्रकार चन्दन और अगरु जैसे दिव्य सौगन्ध्य-सम्पन्न काष्ठ में भी जल एवं मृत्तिका के दीर्घकालीन संसर्ग से सड़ जाने पर दुर्गन्धि प्रकट हो जाती है वैसे ही अविद्या माया के संसर्ग से अनन्त सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश ब्रह्म में नाम-रूप-क्रियात्मक प्रपंच के अध्यारोप के कारण दुःखरूपता प्रादुर्भूत होती है। जैसे चन्दन-काष्ठ के पुनः निघर्षण से उस औपाधिक दौर्गन्ध्य का विनाश तथा स्वाभाविक सौगन्ध्य का प्रस्फुटन हो जाता है वैसे ही ‘ईशावास्यं’ ईश पद के लक्ष्यार्थ परात्पर ब्रह्म, ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ की अपरोक्षानुभूति होने पर उपाधिजन्य 'दुःख जडं अनृतं' विश्व-प्रपन्च का बोध हो जाता है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:

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