Tuesday, 5 February 2019

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56-
गोपी गीत

शास्त्र का कथन है कि -
‘असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते।’
अर्थात, पहले असत्य मार्ग पर चलकर ही सत्य वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है; तात्पर्य कि मिथ्या प्रतिबिम्ब के द्वारा ही सत्य बिम्ब का अनुमान सम्भव है; यह देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार, अनृत जड़ ही हैं तथापि इन्हीं के द्वारा हम अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश, विशुद्ध, परात्पर परब्रह्म को जान लेते हैं। श्रीमद्भागवत-वाक्य है-

‘एषा बुद्धिमतां बुद्धिः मनीषा च मनीषिणाम्।
यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्।।’

अर्थात, अनृत से सत्य को, मर्त्य से अमृत को प्राप्त कर लेना ही बुद्धिमानों की बुद्धिमानी एवं मनीषियों को मनीषा है। ब्रह्म निर्विशेष है; वही ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ सत्य-स्वरूप, ज्ञान-स्वरूप एवं आनन्द-स्वरूप है; ये शब्द अपने पारमार्थिक अर्थों में पर्यवसित नहीं होते; यथार्थतः इन शब्दों से किसी न किसी वसतु की निवृत्ति होती है; जितने भी शब्द हैं वे कोई न कोई विशेषण हैं और किसी न किसी वस्तु का अपनोदन करते हुए ब्रह्म में परिवर्तित हो जाते हैं। उदाहरणतः ‘सत्यं’ शब्द से मिथ्या वस्तु का अपनोदन होता है। अतः ब्रह्म सत्य है का तात्पर्य हुआ नाम-रूप-क्रियात्मक मिथ्या जगत-प्रपन्च से भिन्न तथा उसका भासक जो सत्य है वही ब्रह्म है। इसी तरह ‘ज्ञान’ शब्द से ‘जाड्याभावाधिकरणोपलक्षित ब्रह्म’ जड़ता का अत्यन्ताभावाधिकरण ही ब्रह्म है; यही ‘सत्यं’ ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ है; अस्तु, सूक्ष्मातिसूक्ष्म ब्रह्म की उपासना-हेतु उनके विशेषणों का ध्यान करना पड़ता है।उपलक्षित स्वरूप में भेद होने पर स्वभावतः ही उपलक्ष्य में भी भेद हो जाता है। रामायणान्तर्गत श्रीराम-स्वरूप, श्रीमद्भागवतान्तर्गत श्रीकृष्ण-स्वरूप ‚ शैव-ग्रन्थान्तर्गत शिव-स्वरूप वैष्णवागमान्तर्गत श्रीविष्णु-स्वरूप तथा तन्त्र एवं शाक्तागमान्तर्गत शक्ति किंवा भगवती आदि विभिन्न स्वरूपों से उस एक अनन्त, अखण्ड, निर्विकार, अद्वैतात्मक, परात्पर, परब्रह्म का ही बोधन होता है तथापि उनके स्वरूप, ध्यान एवं विशिष्ट लीलादि उपलक्षणों के आधार पर उनमें भेद भी स्वीकृत हैं।

भिन्न-भिन्न उपलक्षणों के आधार पर अपने-अपने इष्ट का ध्यान किया जाता है। जिनको भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र का इष्ट है उनके लिए भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र के पदारविन्दों का, हस्तारविन्दों का तथा रावणादि राक्षसों के लिए भय एवं विभीषणादि भक्तजनों के अभयकारक-स्वरूप का चिन्तन उचित है।

प्रातर्नमामि रघुनाथपदारविन्दं वज्रांकुशादिशुभरेखि सुखावहं मे।
योगीन्द्रमानसमधुव्रतसेव्यमानं शापापहं सपदि गौतमधर्मपत्न्याः।।
प्रातर्भजामि रघुनाथकरारविन्दं रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेभ्यः।
यद्राजसंसदि विभज्य महेशचापं सीताकरग्रहणमंगलमाप सद्यः।।
प्राततर्वदामि वचसा रघुनाथनाम वाग्दोषहारिसकलं शमलं निहन्तृ।
यत्पार्वती स्वपतिना सह मोक्षकामा भक्तया सहस्रहरिनामसमं जजाप।।

अर्थात, जिसने भरी सभा में महेश का चाप भंग कर सीता के मंगलमय पाणिग्रहणरूप मंगल को प्राप्त किया जिनके चरणारविन्द वज्र, अंकुश, ध्वजाति चिह्नों से युक्त हैं उन भगवान श्री रामचन्द्र का मैं ध्यान करता हूँ।भगवद्-पादारविन्द के वज्र-चिह्न का ध्यान करने से सम्पूर्ण पाप तत्क्षण वज्राहत होकर नष्ट हो जाते हैं। भगवान के पादारविन्द का अंकुश, विषयरूप जल में निमग्न मनरूप मत्स्य को बरबस खींच लेता है अथवा महामत गजेन्द्ररूप मन को वशीभूत कर लेता है। सूर्य-चिह्न के ध्यान से अज्ञानान्धकार का तत्काल अपनोदन एवं स्वप्रकाश तत्त्व का सम्यक् स्फुरण होता है।

सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी।

जिस राम-नाम को विष्णु-सहस्रनाम तुल्य समझकर भगवती पार्वती अपने पति भगवान शिव के संग सदा जपती रहती हैं, ऐसे रघुनाथ रामचन्द्र के मंगलमय पवित्र नाम का प्रातःस्मरण सर्व प्रकार के पाप का शमन एवं वाणीदोष का अपहरण करने वाला है। भगवन्नामोच्चारणरूप वाक्-व्यवहार से वाङ्मय-क्षरणरूप अपराध का विनाश हो जाता है। जिनको भगवान कृष्णचन्द्र का इष्ट है वे परमानन्दकन्द कृष्णचन्द्र का ही ध्यान करें।

वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने।

ऐसे ही भूत-भावन विश्वनाथ सदाशिव, राजराजेश्वरी त्रिपुर-सुन्दरी ललिता पराम्बा आदि अन्य इष्ट के भी विभिन्न उपलक्षण हैं।
निराकार-उपासना हेतु सर्वेश्वरता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता की भावना अनिवार्य है अतः निराकार ब्रह्म-चिंतन भी निर्गुण नहीं है; जैसे आकाश निराकार होते हुए भी शब्द-गुण संयुक्त है वैसे ही निराकार, परात्पर, परब्रह्म भी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वगन्धत्व, सर्वकामत्व, सर्वरसत्त्व, अखण्ड-ब्रह्माण्डनायकत्व, पालकत्व आदि दिव्यातिदिव्य गुण-गणों से संयुक्त हैं। सतत् चिन्तन से प्रवृत्तियाँ अन्तर्मुखी होती है अन्तर्मुखी प्रवृत्ति होने पर मन शांत हो जाता है; मन के शांत होने पर विभिन्न उपलक्षणों का बाधपूर्वक तत्त्व-साक्षात्कार हो जाता है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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