Friday, 1 February 2019

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गोपी गीत

अविद्या-भिन्न मोहिनी शक्ति द्वारा आप्तकाम, पूर्णकाम, परम निष्काम श्रीकृष्णचन्द्र का भी अपनी आप्तकामता, पूर्णकामता, परमनिष्कामता को भुलाकर रासेश्वरी, नित्यनिकुन्जेश्वरी, राधारानी में और रासेश्वरी, नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी को भी अपने तदभिन्न तादात्म्य सम्बन्ध को भुलाकर श्रीकृष्णचन्द्र में पूर्णतः आकर्षण होने पर ही रस-विशेषोल्लास सम्भव है; यह रस-विशेषोल्लास ही शुल्क अथवा मार्ग-निर्वाहक एवं प्रतिबन्ध-निवर्तक द्रव्य है। विमर्ष की अन्तर्मूखता, रस आ अनुल्लास ही प्रतिबन्ध है।

गोपांगनाएँ प्रार्थना कर रही हैं, ‘अशुल्क-दासिका निघ्नतो’ हे सुरतनाथ! हम आपकी अशुल्क-दासिका हैं अतः हमें निमित्त बनाकर रसोल्लास में प्रवृत्त होना ही उचित है, परन्तु ऐसा न कर आप अपने विप्रयोगजन्य तीव्रताप से हमारा वध ही कर रहे हैं। आपकी दृष्टि सर्व-घातकी है, ‘आयुर्मनांसि च दृशा सह ओज आर्च्छत’ आपकी यह क्रूरा दृष्टि आयु, ओज एवं मन को छीन लेती है परन्तु आपका स्वरूप आनन्दमय, सर्वसुखदायी है। हमारे रक्षण के मूल अपने आनन्दमय, सर्वसुखदायां स्वरूप को तिरोहित कर आप अपनी इस सर्व-घातकी दृष्टि से हम अशुल्क-दासिकाओं का वध कर रहे हैं।

अथवा ‘अधीनो निघ्न आयत्तः’ इस कोश के अनुसार यहाँ ‘निघ्नतः’ का अर्थ वशीकार है। जैसे मृगयु मधुर वीणानाद से वशीभूत कर मृग को मारता है किंवा जैसे वंशी में चारा लगाकर मछली को वश में किया जाता है वैसे ही आप भी सरस, सानुराग नयनों से हम अशुल्कदासिकाओं को वशीकृत कर हमारा हनन कर रहे हैं।
अथवा ‘अदृशा अदर्शनेन निघ्नतः’ अर्थात् आप अपने मनोहर मुखचन्द्र का दर्शन न देकर हमारा वध ही कर रहे हैं। आपके दर्शन के बिना जनन-मरण-परम्परा का बाध कदापि सम्भव नहीं होगा। इस जनन-मरण-अविच्छेदरूप संसृति-विच्छेद हेतु ब्रह्म-दर्शन अनिवार्य है। आपका अदर्शन सरसिजश्री को हर लेने वाला है। किंबहुना, भगवद्दर्शन के बिना विश्वलक्ष्मी भी शुष्क हो जाती है, विश्व नीरस हो जाता है। जैसे कम की उदरस्थिता श्री बाहर आते ही अपक्वगर्भ के समान नष्ट हो जाती है वैसे ही आपके अदर्शन से ही नष्ट हो जाती है; आपकी दृष्टि में स्थित रहकर ही वह जीवित रह सकती है। इसी तरह हम व्रजागंनाएँ भी अन्य अनेकानेक साधनों के रहते हुए आपके अदर्शन में जीवन-धारण नहीं कर पा रही हैं; आपके अदर्शन से निश्चय ही हमारा हनन हो रहा है।

श्रीवल्लभाचार्य के मतानुसार सृष्टि के दो प्रकार मान्य हैं; परार्थ एवं आत्मार्थ। प्रकृति के योग से परब्रह्म में जो रस-विशेषोल्लास हुआ वही परार्थ सृष्टि है। शुद्धाद्वैत-मतानुसार प्रकृति स्वतन्त्र तत्त्व नहीं, अपितु सच्चिदानन्द अद्वैत शुद्ध ब्रह्म का अंश ही है। सच्चिदानन्द भगवान में ही तीन भेद हो जाते हैं; प्रथमतः सदंशाश्रित प्रकृति किंवा माया शक्ति, द्वितीय चिदंशाश्रित संवित् शक्ति तथा तृतीय आनन्दाश्रित, आह्लादिनी शक्ति।

प्रकृति के योग से परब्रह्म में जो रसोल्लास हुआ वही परार्थ किंवा आत्मार्थ सृष्टि है। व्यवहारतः जैसे जल एवं अग्नि का संसर्ग होने पर जल में उष्णतारूप से अग्नि अभिव्यक्त हो जाती है वैसे ही प्रकृति एवं परब्रह्म के संयोग से चेतनादि का प्राकट्य होता है; जैसे काष्ठ पर अग्नि का दाहकत्व एवं प्रकाशकत्व दोनों ही अंश प्रकट हो जाते हैं। आत्मार्थ सृष्टि में शुद्ध आनन्द का ही विकास है, शुद्ध आनन्दांश में परब्रह्म-स्वरूप आह्लादिनी शक्ति के योग से आनन्दकन्द परमानन्द श्रीकृष्णचन्द्र, रासेश्वरी नित्यनिकुन्जेश्वरी राधारानी, गोपीजन, लीला एवं सम्पूर्ण उपकरणों का प्राकट्य हुआ; आत्मार्थ एवं लौकिक सृष्टि में यही अन्तर है। सिद्धान्तानुसार सम्पूर्ण ही शुद्ध परब्रह्म है तदपि वह सामान्य दृष्टि का विषय नहीं; परब्रह्म स्वरूप में रसोल्लास होने पर ही रस-विकास सम्भव होता है। एतावता तृतीय पुरुषार्थ काम के आधार पर ही प्रवृत्ति सम्भव है। गोपांगनाजन स्वयं को रस-विशेष पुरुषोत्तम प्रभु में रसोल्लासरूप शुल्क की कामना करती हैं। आत्मार्थ सृष्टि में लीला का आविर्भाव होने पर ही लोकार्थ सृष्टि में उनकी अभिव्यक्ति सम्भव होती है।

गोपांगनाएँ कह रही हैं-हे सुरतनाथ! आपके द्वारा हमें सुरत-सुख की प्राप्ति होनी चाहिए थी परन्तु इसके विपरीत हमारा वध ही कर रहे हैं। ‘श्रीमुषा दृशा।’ आपके अदर्शन से हम गोपांगनाजनों का वध हो रहा है। ‘त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।’ त्रुटिकालपर्यन्त भी आपका अदर्शन हमारे प्राणवियोग का कारण बन जाता है। जितने काल में सूर्य-रश्मि रेणु का उल्लंघन करती है अथवा जितने काल में शतपत्र कमल के एक-एक पत्र का तीव्र गतियुक्त तलवार द्वारा छेदन हो सकता है उतने ही अणुकाल का अथवा उससे भी सूक्ष्म त्रुटिकाल का आपका अदर्शन ही हमारे प्राण-वियोग का कारण बन जाता है।

भागवत का उल्लेख है-

‘रहितात्मनां नः, केचिद् देहहीनाः केचिद् गेहहीना अपि जीवन्ति,
धनहीना अपि जीवन्ति परं रहितात्मनां नः कथं जीवनम्।

अर्थात गेहहीन, धनहीन होकर भी जीवन चल सकता है; कदाचित् देहहीन होकर भी जीवन चल सकता है, परन्तु रहितात्मा होकर जीवन असम्भव हो जाता है। आपके न रहने पर हम ‘रहितात्मानः’ रहितात्मा हो जाती हैं, क्योंकि आप ही हम सबके अन्तरात्मा है। उपनिषद-कथन है, ‘प्राणस्य प्राणः’ अर्थात् भगवान ही प्राणों के प्राण हैं। भगवान ही पारमार्थिक सत्य, चैतन्य, नित्यानन्द, रस-स्वरूप हैं। महर्षि वाल्मीकि का भी कथन है, ‘लोके नहि स विद्येत यो न में राममनुव्रतः।’ अर्थात् लोक में ऐसा कोई प्राणी नहीं जो राम का अनुव्रत न हो। ‘रामचरितमानस’ महर्षि वशिष्ठ का कथन है, ‘प्राण के प्राण जीव जीवन के सुख के सुख राम’ भगवान ही सुख का सुखत्व एवं जीवन की सम्बित् शक्ति है। अतः गोपांगनाएँ कहती हैं कि “हे सुरतनाथ! आप जो हमारे प्राणों के प्राण एवं जीवन के जीवन हैं आपके त्रुटिमात्र का अदर्शन हमारी मृत्यु का कारण बन जाता है।

सरसिजोदर-निवासिनी यह श्री भी आपकी दृष्टि में ही जीवित है इनके लिए भी आपका क्षणिक वियोग असह्य है। जैसे-जल-तरंगों से जल को निकाल देने पर उनका अस्तित्व ही लुप्त हो जाता है, वैसे ही आपके अदर्शन से हमारा अस्तित्व ही लुप्त होने लगता है। हमारे दर्प-दलन के लिए तो आपका कटाक्ष ही पर्याप्त है। निश्चय ही परम दयालु होने के कारण आप हमारी मृत्यु की कामना नहीं करते अतः अपने अदर्शन से हमारीं मृत्यु का कारण न बनें। कुत्सित कार्य तो सर्वदा सर्वत्र वर्जित है; यह तो वृनदावन जैसा पुनीत धाम है जिसकी पूजा सुख एवं शान्ति-कामना से की जाती है, अतः यहाँ तो वध और वह भी स्त्रियों का दृशा-वध जैसा अत्यन्त कुत्सित कर्म कदापि नहीं करना चाहिए।”
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:

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