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गोपी गीत
गोपांगनाएँ कल्पना करती हैं कि श्यामसुन्दर कह रहे हैं कि “सखि! हम तो वध करते ही नहीं; तुम स्वयं ही कर रही हो कि हमारी दृष्टि से तुम्हारा वध हो रहा है अतः दोष हमारा नहीं, अपितु हमारी इस वधकारिका दृष्टि का ही है।” उत्तर देती हुई गोपांगनाएँ कहती हैं, “जैसे राजा स्वयं अपने हाथों से किसी का वध नहीं करता तदपि उसके रहस्यज्ञ अनुचरों द्वारा किये गये वध का उत्तरदायित्व राजा पर ही होता है वैसे ही आप स्वयं भी हमारा वध न कर अपनी सर्वहारा, सर्वघात की दृष्टि से हमारा वध करा रहे हैं अतः वस्तुतः तो आप ही इस दृशावध के लिए भी उत्तरदायी हैं। हम तो आपकी मित्र हैं, परम-प्रेयसी, अनुरागिणीजन हैं; हमारा वध करना तो मित्र-द्रोह जैसा घोर पातक है।”
गोपांगनाएँ कह रही हैं, हे श्यामसुन्दर! अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक अखिलेश्वर परमात्मा दारुयंत्रवत् हमारे वशीभूत हैं ऐसा दर्प हम लोगों को हो जाने पर ही हमारे दर्प-दलन हेतु ‘प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत’ की गई आपकी यह अन्तर्धान-लीला फलीभूत हो गई; अब तो कृपा कर दर्शन देकर हमें प्राणदान करें। व्रज-सीमन्तिनी-जन भगवान मधुसूदन के वास्तविक स्वरूप से पूर्णतः अभिज्ञ होते हुए भी लीला-हेतुमोहिनी मायाशक्ति के प्रावरण से आच्छादित हैं क्योंकि ऐश्वर्य-विज्ञान संकोचकारक तथा स्वाभाविक, स्वरसिक, निर्भर अनुरागजन्य मदीयत्वाभिमान का विघटक है; फलतः सम्पूर्ण लीला ही असम्भव हो जाती। उनकी उक्ति है-
‘यस्याः कदापि वसनान्चलखेलनोत्थ धन्यातिधन्यपवनेन कृतार्थमानी।
योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि तस्यै नमोऽस्तु वृषभानुभुवो दिशेऽपि।’
अर्थात, जिस दिशा में वृषभानुनन्दिनी राधारानी विराजमान हैं उस दिशा को भी हम नमस्कार करती हैं क्योंकि अखिल-ब्रह्माण्ड-नायक, सर्वेश्वर, प्रभु कृष्ण जो योगीन्द्र-दुर्गम-गति हैं, जो विज्ञान-दुर्लभ हैं; वे भी राधारानी के वसनान्चल की हलचल से उत्पन्न पवन के संसर्ग से अपने-आपको धन्य मानते हैं। लोकदृष्ट्या दर्पानुभूति त्याज्य है। जीवार्थ सृष्टि में अनतर्धान-लीला लोक-शिक्षार्थ ही हुई। यथार्थ में गोपांगनाओं का यह मदीयत्वाभिमान विशिष्ट अलंकारस्वरूप एवं स्तुत्य है। नित्य-निकुंजेश्वरी, राजेश्वरी, राधारानी ही परम-मानिनी नायिका है। तात्पर्य यह कि अनुचित गर्व-प्रशमन एवं दर्प-दमन-हेतु अन्तर्धान-लीलाएँ हुई।
भगवत-भावना-भावित चित्त की सम्पूर्ण भाव-स्थितियाँ भक्ति-रसामृत-सिंधु की लहरी-कोटि में ही मान्य हैं; काम, क्रोध, ईर्ष्या, भय, स्नेह आदि किसी भी भावना से भगवान में चित्त लगाने से प्राणी का कल्याण हो जाता है जैसे रसपरिप्लुत होने पर अपक्व एवं अम्ल फल के स्वाद में भी विशिष्ट चमत्कृति आ जाती है वैसे ही भक्ति-रस-परिप्लुत होने पर मन की विकृतियाँ भी चमत्कृत हो भक्ति-रसामृत-सिन्धु की लहरी-कोटि के अन्तर्गत आ जाती हैं। श्री वल्लभाचार्यजी के मतानुसार व्रजधाम, गोप-सीमन्तिनी जन आदि सम्पूर्णतः आत्मार्थ सृष्टि का ही विकास है, फलतः स्वभावतः ही रसात्मक है।
अन्य एक मत यह भी है कि लक्ष्मी ब्रह्म से भिन्न है। लक्ष्मी, ब्रह्म एवं जीव दोनों से ही विलक्षण हैं; जीव अणु हैं लक्ष्मी व्यापिका हैं; परब्रह्म सर्वशेषी हैं लक्ष्मी शेष हैं। जैसे माता, पिता एवं पुत्र दोनों से ही विलक्षण हैं वैसे ही लक्ष्मी ब्रह्म एवं जीव दोनों से ही विलक्षण हैं। अन्यमतानुसार चित् ब्रह्म की शक्ति है एवं सम्पूर्ण संसार चित् का ही परिणाम है अतः संपूर्ण ब्रह्मात्म ही है। अचिन्त्य भेदाभेदवादी गौड़ीय-सम्प्रदाय-मतानुसार भी लक्ष्मी जीवकोटि में ही आती हैं अतः लक्ष्मी को पूर्णरूपेण अभिन्न, सत्-चित्-रूपिणी नहीं कहा जा सकता; अतः अचिन्त्य-भेदाभेद का प्रतिपादन हुआ। तात्पर्य यह कि ब्रह्म सर्वदा सर्वव्याप्त है तथापि उसकी स्फुट प्रतीति भावुक तथा आत्माराम महर्षि जनों द्वारा ही संभव है।
अद्वैतमतानुसार भी ‘रसो वै सः’ सम्पूर्ण रस ही सच्चिदानन्द परब्रह्म-स्वरूप ही है किन्तु लीला के क्षेत्र में आलम्बन एवं उद्दीपन ही कुछ लौकिक होते हैं। जैसे आदित्य का रूप मेघ के सम्बन्ध से आच्छादित हो जाता है परन्तु दिव्य उपनेत्र अथवा दूर-वीक्षण यन्त्र के सम्बन्ध से आवृत नहीं होता अपितु दिव्यभाव से स्पष्ट हो उठता है वैसे ही प्रपन्चोत्पादिनी मलिन शक्ति के सम्बन्ध से प्रपन्चरूप में प्रकट ब्रह्म का निजी स्वरूप तिरोहित या आच्छादित हो जाता है। परन्तु दिव्य लीला-शक्ति के योग से दिव्य-मधुर, सगुण एवं साकाररूप से प्रकट हो जाता है। सिद्धान्त है कि ‘हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्’ सत्त्वादि गुणकृत प्रभाव से विनिर्मुक्त होने के कारण ही हरि निर्गुण हैं। ‘रजस्तमोऽननुविद्व सत्त्व’ रजोगुण एवं तमोगुण से अननुविद्व सत्त्व भगवत-स्वरूप का आच्छादक नहीं अपितु व्यवधायक है।
श्रीधरस्वामीकृत व्याख्या अद्वैत-मत पर ही आधारित है। अद्वैत-मतानुसार ‘सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः' सत्य, ज्ञान एवं अनन्त आनन्दस्वरूप ही रस-मूर्ति है; तात्पर्य कि माया एवं गुण-रहित, सर्वअनात्मांश-विवर्जित, विशुद्ध रसमूर्ति हैं। ब्रह्मा द्वारा गोप-बालकों का उनके गोधन के साथ अपहरण किये जाने पर भगवान कृष्ण स्वयं ही गोप-बालक-समूह एवं गोवृन्द रूप में प्रकट हुए। उस समय ब्रह्मा ने प्रत्येक गोप-बालक के सम्मुख चौबीसों तत्त्वों को मूर्तिमान् हो स्तुति करते हुए देखा; अव्यक्त, महत्, अहम्, पन्चतन्मात्रा एवं षोडश विकार ही चौबीस तत्त्व हैं। ‘सच्चिन्मयो नीलिमा’ श्याम तेज, विष्णुरूप ही दशम तत्त्व हैं। जैसे शैत्य के योग से जल हिमखण्ड बन जाता है तदपि उस हिम-खण्ड का आधार एवं अस्तित्व भी जल ही है, अथवा जैसे घृत एवं वर्तिका दीपशिखाप्राकट्य के निमित्तमात्र होते हैं वैसे ही भगवान भी अपनी लीला-शक्ति, वैष्णवी माया द्वारा मंगलमय देह धारण करते हैं।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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