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गोपी गीत
यह लीला-शक्ति भगवान की परम-अन्तरंगा है। जिस प्रकार बीज में शाखा, पल्लव, पुष्प और फल सभी अंगों को उत्पन्न करने की अनेक शक्तियाँ रहती हैं उसी प्रकार महाशक्ति में ही विश्व-विकास की समस्त शक्तियाँ रहती हैं। तात्पर्य कि वह भगवदीय महामाया-शक्ति अनन्त शक्तियों का पुन्ज है। उसमें जिस प्रकार अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड और उसके अन्तर्वर्ती विचित्र भोग्य, भोक्ता और उनके नियामक आदि प्रपन्च को उत्पन्न करने की अनन्त शक्तियाँ हैं उसी प्रकार उन अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के अधीश्वर श्री भगवान के दिव्य मंगलमय-विग्रह में आविर्भूत होने के अनुकूल भी एक परम विशुद्धा, अन्तरंगा शक्ति है।
भगवान की अनिर्वचनीया आत्मयोग-भूता, महाशक्ति के अन्तर्गत होने के कारण अनिर्वचनीयता में अन्य प्रपन्चोत्पादनानुकूल शक्तियों के समान होने पर भी उनकी अपेक्षा कहीं अधिक स्वच्छ एवं दिव्य है। इस विलक्षण शक्ति का निर्देश पराशक्ति एवं अन्तरंग-शक्ति आदि शब्दों द्वारा भी किया जाता है। यह शक्ति भगवत-स्वरूप में प्रविष्ट रहती हुई ही उसके प्राकट्य का निमित्त होती है। जिस प्रकार उपाधिविरहित दाहकत्व-प्रकाशकत्व-रहित अग्नि के दाहकत्व-प्रकाशकत्व-संयुक्त दीपशिखादि रूप की अभिव्यक्ति में तैल तथा सूत्र आदि केवल निमित्तमात्र ही हैं किंवा जैसे तरंग-विरहित नीर-निधि के तरंगयुक्त होने में वायु केवल निमित्तमात्र ही है ठीक उसी प्रकार विशुद्ध लीला-शक्तिरूप निमित्त से शुद्ध परब्रह्म ही अनन्त-कल्याण-गुण-गण-विशिष्ट सगुण विग्रह में अभिव्यक्त होते हैं। तथापि उनका वह विग्रह वस्तुतः मूर्तिमान् शुद्ध परमानन्द ही है। उसमें उस दिव्य-शक्ति का भी निवेश नहीं, वह तो तटस्थ रूप से केवल निमित्तमात्र है। इसी से भगवान की सगुण मूर्ति में ‘आनन्दमात्र करपादमुखोदरादि’ ‘आनन्दमात्रैकरसमूर्तयः’ इत्यादि उक्तियाँ हैं।
विशुद्ध सत्त्व को निमित्त मानकर निर्विकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही कृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द रासेश्वरी राधारानी एवं व्रज-सीमन्तिनी-जन आदि विभिन्न रूपों में प्रकट हो गया है अतः सम्पूर्ण लीला ही शुद्ध-निर्विकार एवं एकरस है; एतावता भागवत-भावना-भावित चित्त के सम्पूर्ण विकार भक्ति-रसामृतंसिंधु की विभिन्न लहरियाँ ही है; अस्तु, यह दर्प भी प्रभु को प्रिय है। गोपांगनाएँ कह रही हैं हे सुरतनाथ! इस मान को मनाने हेतु एवं अनुचित दर्प का प्रशमन करने हेतु आप शीघ्र ही प्रत्यक्ष हो जायँ।
मुग्धा एवं मानिनी व्रजांगनाओं की ओर से भी यह युक्ति संगत होती है। मुग्धा अनभिज्ञा होती है; वे दैन्य व्यक्त करती हुई भगवान श्रीकृष्ण से प्राकट्य हेतु प्रार्थना करती हैं। हे सुरतनाथ! सर्वविध याचित कामनाओं के पूर्ण करने वाले हे वरद! सर्व प्रकार के अभीष्ट वर को देने वाले, सर्वेश्वर! आपके विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से हम लोग सन्तप्त हो रही हैं आपके अदर्शन से निश्चय ही हम मृत्यु को प्राप्त हो जायँगी; अस्तु, कृपा कर आप हमारे लिए प्रत्यक्ष हो जायँ।
हे सुरतनाथ! हम आपकी अशुल्क-दासिका; अक्रीत-दासिका हैं। विवाह से प्राप्त अथवा संक्रीता ही शुल्क-दासिका हैं। संक्रीता दासिकाओं को आप मारे अथवा जिलायें ‘वंय तु अशुल्कदासिकाः’ हम तो आपकी अशुल्क-दासिका हैं। ‘दृशैव वशीभूताः’ आपकी इस मनोहारिणी दृष्टि के वशीभूत हो हम आपके सन्निधान में चली आयी हैं। आपकी दृष्टि ने शरद्-कालीन, स्वच्छ जलाशय में उद्भूत सरसिज-सम्राट् के कर्णिकान्तर्निवासिनी श्री का अपहरण कर लिया है; हम व्रजांगनाएँ भी आपकी इस दृष्टि द्वारा ही वशीभूत कर ली गई हैं।
अशुल्कदासिका शब्द में ‘कन्’ प्रत्यय का व्यवहार है; ‘कन्’ प्रत्यय का व्यवहार दैन्यसूचक होता है। तात्पर्य कि गोपांगनाएँ कह रही हैं कि हे मदन-मोहन! आपकी मनोहारिणी दृष्टि द्वारा वशीकृता हो हम व्रजांगनाएँ आपके सन्निधान में चली आई हैं अतः हम अन्चिता, अशुल्क-दासिका हैं और इसीलिये अधिक अनुकम्पनीया भी हैं। एतावता विशेषः हम व्रजांगनाओं को अपने आनन्दमय, सुखमय श्री अंग का दर्शन देकर जीवन-दान देना ही उचित है; साथ ही, अपनी अनुकम्पामयी दृष्टि से हमारा वीक्षण भी होना चाहिए।मानिनी व्रजांगनाएँ कह रही हैं; हे मदन-मोहन! आप जो अपने अदर्शन को हेतु बनाकर इस असंख्यात अशुल्क-दासिकाओं का वध कर रहे हैं; इस अनर्थ से उत्पन्न पातक से तो डरें। ये मुग्धाएँ आपकी शुल्क-दासिका नहीं है अपितु आपकी दृष्टि से ही आपके वशीभूत हैं अतः विशेषतः रक्षणीया हैं। इनका वध तो सर्वथा घोर कर्म है अतः आप शीघ्र प्रकट होकर इनको जीवन-दान करें।
वैदिक एवं तान्त्रिक ऐसे अनेक आभिचारिक कर्म होते हैं जिनके आधार पर बिना शस्त्रास्त्र ही शत्रु का हनन कर दिया जाता है। गोपांगनाएँ कह रही हैं कि हे श्यामसुन्दर! यह दृशावध भी आभिचारिक कर्म है। क्या यह अभिचार-कर्म, दृशा-घात भी वध नहीं है? हे मदन-मोहन! आपकी यह दृष्टि भी एक प्रकार का शर ही है। कुसुमधन्वा, कन्दर्प कुसुम-धनुष एवं कुसुम-शर द्वारा ही सम्पूर्ण संसार को वशीभूत किये हुए है।
‘काम कुसुम धनु सायक लीन्हें। सकल भुवन अपने बस कीन्हें।’
सम्पूर्ण कुसुमों में सरसिज ही परम प्रधान परमोत्कृष्ट है। शरत्कालीन स्वच्छ अगाध जलाशय में उद्भूत सरसिज-सम्राट् के कर्णिकान्तरनिवासिनी नवनवायमान श्री का अपहरण कर लेने वाली आपकी यह दृष्टि ही मानों कुसुमधन्वा, कन्दर्प का सर्वोत्कृष्ट शर है। आपके इन नेत्र-शरों द्वारा ही हम मनोरमा रमा-जनों का वध हो रहा है।
सुरतनाथ! ‘अस्ति सुरतिर्येषां ते सुरताः’ जो आपमें सुष्ठु रूप से रत हैं, जो सम्यक् प्रकार से आपके भक्त हैं, वही सुरत हैं। इन सुरतजनों के नाथ, सुरतनाथ! आप तो स्वभाव से ही ‘सुरतानां नाथः सुरतानामुपतापकः’ सुरत जनों के तापक हैं। कहते हैं विष्णु की भक्ति करने वाले दरिद्र हो जाते हैं। भगवान स्वयं भी कहते हैं कि जिस पर उनका अनुग्रह होता है उसको वे देह-गेह-हीन कर देते हैं। जो आपके अत्यन्त रीति-प्रीतियुक्त हैं उनको भी आप सदा-सर्वदा उपताप ही पहुँचाते हैं। आपमें रति-प्रीति-युक्तजन आपके अदर्शन में दर्शन के लिए व्याकुल रहते हैं; दर्शन होने पर विप्रलम्भ-भय से सन्तप्त रहते हैं। रासेश्वरी राधारानी में प्रेम का ऐसा अद्भुत संचार है जिसको स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी नहीं समझ पाते और ललिता प्रभृति सखियों से कहने लगते हैं-
‘पूर्वानुरागगलितां मम लम्भनेऽपि
लोकापवाददलितामथ मद्वियुक्तौ।
दावानलज्वलितजातिवनीसदृक्षा-
मेतां कथं कथमहो बत सान्त्वयामि।’
अर्थात् हे सखी! यह (राधारानी) तो मेरे पूर्वराग में ही गलित हो चुकी है; मेरे सम्मिलन में भी लोकापवाद से दलित होती है; विप्रयोग में तो यह दावानल-ज्वलित-जातिवली सदृश हो जाती है। मैं इन्हें कैसे सान्त्वना दूँ?
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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