Friday, 1 February 2019

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गोपी गीत

मानिनी व्रजांगनाएँ पुनः कह रही हैं हे वरद! ‘स्वदत्तानामपि वराणां खण्डकः वरान् द्यति खण्डयतीति वरदः’ आप अपने दिए हुए वरदान का ही खण्डन करने वाले हैं। कात्यायनी-व्रत के अन्तर्गत आपने स्वयं ही प्रकट होकर हम व्रजांगनाओं को स्वस्वरूप-संभोग का वरदान दिया था; अब अन्तर्धान होकर आप अपने दिए हुए वरदान का ही छेदन कर रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण में मानिनी गोपांगनाएँ दोषानुसन्धान, असूया करती हुई ‘वरद’ ‘सुरतनाथ’ सम्बोधनों का प्रयोग करती हैं।
श्रुति कथन है-‘शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति।’ अर्थात् शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु, श्रद्धान्वित, समाहित होकर अपने देह में, अपने आत्मा में अन्तःकरण में ही उस सर्वान्तरात्मा, सर्वान्तर्यामी का अनुसन्धान करो। ‘न गृहे विनष्टं वस्तु वनेन्विष्यते’ घर में खोई हुई वस्तु को घर में ही खोजना उचित है। श्रीमद्भागवत-कथन है-

‘त्वामात्मानं परं मत्वा परमात्मानमेव च।
आत्मा पुनर्बहिर्मृग्य अहोऽज्ञजनताऽज्ञता।’

देहादिकों को आत्मा और आत्मा को देहादिक समझकर अज्ञ आत्मा को खोजते हुए बाहर भटकता है। वस्तुतः अन्तर्मुखता ही परम वांछनीय है, अन्तर्मुखी प्रवृत्ति हो जाने पर प्राणी सर्वत्र ही भगवत-स्वरूप का अनुभव प्राप्त कर शान्ति प्राप्त कर सकता है।

‘अन्तर्भवेऽनन्त भवन्तमेव ह्यतत्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः।
असन्तमप्यन्त्यहिमन्तरेण सन्तं गुणं तं किमु यन्ति सन्तः।’

ब्रह्मस्तुति है, हे अनन्त! हे अपरिच्छिन्न, सर्वेश्वर प्रभो! विज्ञ-जन शरीर के भीतर ही आपका अनुसन्धान करते हैं। जैसे अत्यन्त सावधानी के साथ मूँज में से सींक निकाल ली जाती है वैसे अन्नमयादि पन्चकोषों से आवृत, सींकस्थानीय निर्विकार, आनन्दस्वरूप, चिदात्मा को भी प्राप्त कर लिया जाता है। देहेन्द्रियादि रूप उपाधि के तादात्म्याध्यास से कर्तृव्य-भोक्तृत्वादि अनेकानर्थपरिप्लुत आत्मा सम्पूर्ण् सजातीय-विजातीय स्वगत भेदों को त्यागकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है। उदाहरणार्थ यद्यपि रज्जु में सर्प नहीं है तथापि मिथ्याभ्रम विषयोभूत-सर्प के कल्पित अस्तित्व का बोध न हो जाने तक विद्यमान रज्जु का अनुभव असम्भव है। ‘अध्यारोपापवादाभ्यां मिष्प्रपन्चं प्रपन्च्यते।’ अध्यारोप एवं अपवाद के द्वारा ही अधिष्ठानभूत निष्प्रपन्च ब्रह्मतत्त्व का वर्णन किया जाता है।

अध्यारोप के द्वारा ब्रह्म को निखिल-प्रपंच का चरम कारण मानकर उससे सृष्टि का क्रम बतलाया जाता है और अपवाद के द्वारा दृश्यमात्र का अनात्मत्व प्रतिपादन करते हुए साक्षी चेतन का शोधन किया जाता है। इसी क्रम से शुद्ध परब्रह्म लक्षित हो जाता है। जीव स्वभावतः शुद्ध तत्त्व से अनभिज्ञ है अतः इस दृश्य-प्रपंच के कारण के अन्वेषण द्वारा ही उसका बोध सम्भव होता है। अध्यारोप एवं अपवाद, दोनों ही जिसमें अधिष्ठित होने से सिद्ध होते हैं वह परब्रह्म ही आश्रय नाम दसवाँ तत्त्व है। श्रीमद्भागवत में भी आश्रय का लक्षण इस प्रकार किया गया है-

‘आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते।
स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते।’

‘आभास’ अध्यारोप को और ‘निरोध’ अपवाद को कहते हैं। श्रीमद्भागवत-कथन है, ‘दशमस्य विशुद्धयर्थ नवानामिह लक्षणम्।’ दशम-स्कन्ध में जो दशम-तत्त्व का निरूपण किया गया है उसकी विशुद्धि के लिए ही पूर्ववर्ती नव स्कन्ध हैं।

‘अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः।
मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः।’

अर्थात सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वतन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति एवं आश्रय इनमें भी दशम की विशुद्धि के लिए ही शेष नौ का कीर्तन किया गया है। सम्पूर्ण शास्त्र ही भगवान के वाङ्मय-विग्रह हैं। श्रीमद्भागवत भगवान का सविशेष-निर्विशेष सम्मिलित-स्वरूप है; उसमें सर्ग-विसर्गादि दसों तत्त्वों का सांगोपांग वर्णन है किन्तु दशम-स्कन्ध में केवल आश्रय नामक दशम तत्त्व का ही वर्णन है। ‘दशमे दशमो हरिः।’ जिस प्रकार एक सुधासिंधु में नाना प्रकार के तरंगों का प्रादुर्भाव होता है उसी प्रकार दशम-स्कन्ध में जितनी लीलाओं का प्रादुर्भाव हुआ है वे सब भगवान की नित्य-लीला की ही अभिव्यक्ति मात्र हैं, अतः भगवल्लीला-सम्बन्धी जितने विषय हैं वे सब भगवद्रूप हैं।

मधुसूदनजी कहते हैं, ‘नीलं महो धावति।’ अर्थात् महान्-नील-तेज यमुना-पुलिन-पर दौड़ रहा है। तात्पर्य कि जिसके तेज से दीप्त होकर सूर्य प्रकाशवान् हो रहा है, जो अनन्त ज्योति है ‘ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः।’ ज्योतियों का भी ज्योति है, वही परात्पर परब्रह्म ‘नीलं महः’ कृष्णरूप में यमुना-पुलिन पर क्रीड़ा कर रहा है। शंकराचार्य कहते हैं-

‘ब्रह्माण्डानि बहूनि पंकजभवान् प्रत्यण्डमत्यद्भुतान्
गोपान् वत्सयुतानदर्शयदजं विष्णूनशेषांश्च यः।
शम्भुर्यच्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते य मूर्तित्रयात्
कृष्णौ वै पृथगस्तु कोऽपि कृतयः सच्चिन्मयी नीलिमा।’

अविकृत सच्चिन्मयी नीलिमा ही कृष्ण है। ‘मूर्तित्रयात् पृथगस्तु’ जो ब्रह्मा-विष्णु-महेश, त्रिमूर्ति से भिन्न हैं, जिसने ब्रह्मा को भी अपरिगणित ब्रह्माण्ड दिखाए; ब्रह्माजी स्तुति कर रहे हैं।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:

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