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गोपी गीत
भगवत्-चरणारविन्द-विमुख प्राणी संसृति-चक्र में आबद्ध हो अनेकानेक क्लेश का भागी होता है परन्तु मुकुन्द-सेवी संसृति-चक्र-विनिर्मुक्त हो जाता है क्योंकि ‘स्मरन् मुकुन्दाङ्घ्र्यु्रपगूहनं पुनर्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः।जिसको क्षणभर के लिए भी श्री अंग के दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य का अनुभव हो गया वह मुकुन्द-चरणारविन्दों के उपगूहन की स्मृति में ही सदा निमग्न रहता है क्योंकि एक बार ऐसा रसग्रह हो जाने पर दुनिया के इतर सम्पूर्ण रस नीरस प्रतीत होने लगते हैं। विधान हैः- ‘विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा हृदोपगुह्यावसितं समाहितैः।’
अनात्म-भावनाओं को त्यागकर अनन्य सौहार्द, अनन्य अनुरागपूर्वक हृदय से भगवान् के मंगलमय पाद-पंकज का क्षण-प्रतिक्षण उपगूहन करो। जैसे कोई रंक चिन्तामणि को प्राप्त कर सदा-सर्वदा विशेष सतर्कतापूर्ण उसकी सँभाल में खोया रहता है उसी तरह भगवद्-चरणानुरागी भी भगवद्-पाद-पंकजों के उपगूहन के रस के आनन्द का क्षण-प्रतिक्षण स्मरण करता हुआ सदा ही उसी में खोया रहता है। अतः भगवद्-चरणारविन्द उपगूहन रसास्वाद में निरन्तर निमग्न प्राणी अन्य जनों की तरह संसृति-चक्र से कदापि आबद्ध नहीं हो सकता। भगवत्-कृपावशात् ही भगवद्-पाद-पंकज उपगूहन का रसास्वादन सम्भव है।
गोपांगनाएँ कह रही हैं ‘त्वयदेव सुरतिः इच्छा अस्मिन् मनसि ताविता’ हे श्यामसुन्दर! मदनमोहन! आपने ही हमारे हृदय में भगवद्-स्वरूप-सम्भोग की इच्छा उद्भूत की; आपका अनुग्रह न होने पर भगवद्-सम्मिलन की इच्छा कदापि उद्भूत न हो सकती थी। श्री वल्लभाचार्यजी कहते हैं ‘जीवाः स्वभावतो दुष्टाः सर्व कुर्वन्ति भगवन्तं न भजन्ति’ स्वभाव से दुष्ट जीव अन्य सम्पूर्ण लौकिक क्रियाकलाप करता है परन्तु भगवत्-स्मरण में प्रवृत्त नहीं होता। भगवत्-प्रेरणा से ही जीव में भगवदनुराग उद्भूत हो सकता है। उपनिषद् का सिद्धान्त है ‘यमेवैष वृणुते’ इसकी व्याख्या करते हुए श्री रामानुजाचार्य जी कहते हैं ‘एष परमात्मा यं साधकं वृणुते स्वकीयत्वेन स्वीकरोति’ अर्थात्, जैसे स्वयंवरा कन्या जिसको स्वकीयत्वेन स्वीकार कर लेती है उसी को अपने विशुद्ध स्वरूप का ज्ञान कराती है वैसे ही जिस साधक को सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधिष्ठान प्रभु स्वकीय भाव से स्वीकार कर लेते हैं उसको ही अपने विशुद्ध स्वरूप का ज्ञान कराते हैं।
भक्त्या मामभिनाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।’सम्पूर्ण रूप से गुणविभूतियुक्त तत्त्वरूप भगवद्-स्वरूप का दर्शन, परिज्ञान उसको ही होता है जिसको भगवान् ने स्वकीय-भाव से स्वीकार कर लिया है। ‘यस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’ उस वरण को ही भगवान् अपना आत्मा, अपना तनु, अपना स्वरूप-दर्शन देते हैं; वह वरण ही अन्यतम, अनन्तान, निर्विकार भगवद्-स्वरूप का दर्शन पा सकता है। स्वयंवरा कन्या के लिए किसी व्यक्ति-विशेष-विषयक भावोद्रेक सहज ही है परन्तु परात्पर परब्रह्म प्राणी मात्र में समभाव रखते हैं; भगवत्-कथन है, ‘समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।’ प्राणीमात्र में मुझे समभाव है, न मेरा कोई प्रिय है न द्वेषी; जो मुझे भक्तिपूर्वक भजता है मैं भी उसको भजता हूँ।
दूसरी व्याख्या शंकराचार्यजी करते हैं, ‘एष साधकः यं परमात्मानं वृणुते’ अर्थात्, जब साधक प्रभु का वरण कर लेते हैं। जीव अनादि हैं; जीव एवं भगवान् का सम्बन्ध भी अनादिकाल से चला आया है; इस अनादि प्राग्भाव के ध्वस्त हो जाने पर घट-पटादि की उत्पत्ति होती है। पूर्व-पूर्व भगवद्वरण से उत्तरोत्तर भगवदनुग्रह की प्राप्ति होती है, एतावता उभय में हेतुहेतुमद्भाव बन जाता है। पूर्ण भगवदनुकम्पावश ही जीव में भगवद्वरेण्य गुणगणों का आविर्भाव होता है। अस्तु, गोपांगनाएँ कह रही हैं हे मदन-मोहन! आप ही हमारे सुरत के प्रेरक हैं; आप ही ने हमसे सुरत की याच्ञा भी की; नायक द्वारा सुरत का याच्ञा करने पर नायिका की कामना भी उत्कट हो जाती है। अनन्त ब्रह्माण्ड-नायक परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र ने रासेश्वरी नित्यनिकुन्जेश्वरी, वृषभानुदुलारी राधारानी एवं उनकी परमान्तरंगा गोपांगनाओं से सुरतयाच्ञा की अतः उनमें भी उत्कट कामना उद्भूत हुई। इस उत्कट कामना को भी आप ही ने ‘वरदानेन दृढीकृता’ वरदान द्वारा दृढ़ीकृत किया है।
मर्यादापुरुषोत्तम राघवेन्द्र रामचन्द्र स्वरूप में भगवान् का आविर्भाव अयोध्या में हुआ। राजा दशरथ ने रामचन्द्र को युवराज-पद पर अभिषिक्त करने का अयोजन किया; ऋषियों और देवताओं के सम्मिलित षड्यन्त्र के कारण राघवेन्द्र रामचन्द्र के राज्य-सिंहासनारोहण का मंगल आयोजन सफल न हो सका; अपने पिता राजा दशरथ द्वारा कैकेयी को दिये गये वचनों का परिपालन करने हेतु राघवेन्द्र रामचन्द्र ने सम्पूर्ण राज्योचित श्रृंगार को त्यागकर जटा एवं वल्कल धारण कर वन की ओर प्रस्थान किया।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश: