Monday, 28 January 2019

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गोपी गीत

भगवत्-चरणारविन्द-विमुख प्राणी संसृति-चक्र में आबद्ध हो अनेकानेक क्लेश का भागी होता है परन्तु मुकुन्द-सेवी संसृति-चक्र-विनिर्मुक्त हो जाता है क्योंकि ‘स्मरन् मुकुन्दाङ्घ्र्यु्रपगूहनं पुनर्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः।जिसको क्षणभर के लिए भी श्री अंग के दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य का अनुभव हो गया वह मुकुन्द-चरणारविन्दों के उपगूहन की स्मृति में ही सदा निमग्न रहता है क्योंकि एक बार ऐसा रसग्रह हो जाने पर दुनिया के इतर सम्पूर्ण रस नीरस प्रतीत होने लगते हैं। विधान हैः- ‘विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा हृदोपगुह्यावसितं समाहितैः।’

अनात्म-भावनाओं को त्यागकर अनन्य सौहार्द, अनन्य अनुरागपूर्वक हृदय से भगवान् के मंगलमय पाद-पंकज का क्षण-प्रतिक्षण उपगूहन करो। जैसे कोई रंक चिन्तामणि को प्राप्त कर सदा-सर्वदा विशेष सतर्कतापूर्ण उसकी सँभाल में खोया रहता है उसी तरह भगवद्-चरणानुरागी भी भगवद्-पाद-पंकजों के उपगूहन के रस के आनन्द का क्षण-प्रतिक्षण स्मरण करता हुआ सदा ही उसी में खोया रहता है। अतः भगवद्-चरणारविन्द उपगूहन रसास्वाद में निरन्तर निमग्न प्राणी अन्य जनों की तरह संसृति-चक्र से कदापि आबद्ध नहीं हो सकता। भगवत्-कृपावशात् ही भगवद्-पाद-पंकज उपगूहन का रसास्वादन सम्भव है।

गोपांगनाएँ कह रही हैं ‘त्वयदेव सुरतिः इच्छा अस्मिन् मनसि ताविता’ हे श्यामसुन्दर! मदनमोहन! आपने ही हमारे हृदय में भगवद्-स्वरूप-सम्भोग की इच्छा उद्भूत की; आपका अनुग्रह न होने पर भगवद्-सम्मिलन की इच्छा कदापि उद्भूत न हो सकती थी। श्री वल्लभाचार्यजी कहते हैं ‘जीवाः स्वभावतो दुष्टाः सर्व कुर्वन्ति भगवन्तं न भजन्ति’ स्वभाव से दुष्ट जीव अन्य सम्पूर्ण लौकिक क्रियाकलाप करता है परन्तु भगवत्-स्मरण में प्रवृत्त नहीं होता। भगवत्-प्रेरणा से ही जीव में भगवदनुराग उद्भूत हो सकता है। उपनिषद् का सिद्धान्त है ‘यमेवैष वृणुते’ इसकी व्याख्या करते हुए श्री रामानुजाचार्य जी कहते हैं ‘एष परमात्मा यं साधकं वृणुते स्वकीयत्वेन स्वीकरोति’ अर्थात्, जैसे स्वयंवरा कन्या जिसको स्वकीयत्वेन स्वीकार कर लेती है उसी को अपने विशुद्ध स्वरूप का ज्ञान कराती है वैसे ही जिस साधक को सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधिष्ठान प्रभु स्वकीय भाव से स्वीकार कर लेते हैं उसको ही अपने विशुद्ध स्वरूप का ज्ञान कराते हैं।

भक्त्या मामभिनाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।’सम्पूर्ण रूप से गुणविभूतियुक्त तत्त्वरूप भगवद्-स्वरूप का दर्शन, परिज्ञान उसको ही होता है जिसको भगवान् ने स्वकीय-भाव से स्वीकार कर लिया है। ‘यस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’ उस वरण को ही भगवान् अपना आत्मा, अपना तनु, अपना स्वरूप-दर्शन देते हैं; वह वरण ही अन्यतम, अनन्तान, निर्विकार भगवद्-स्वरूप का दर्शन पा सकता है। स्वयंवरा कन्या के लिए किसी व्यक्ति-विशेष-विषयक भावोद्रेक सहज ही है परन्तु परात्पर परब्रह्म प्राणी मात्र में समभाव रखते हैं; भगवत्-कथन है, ‘समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।’ प्राणीमात्र में मुझे समभाव है, न मेरा कोई प्रिय है न द्वेषी; जो मुझे भक्तिपूर्वक भजता है मैं भी उसको भजता हूँ।

दूसरी व्याख्या शंकराचार्यजी करते हैं, ‘एष साधकः यं परमात्मानं वृणुते’ अर्थात्, जब साधक प्रभु का वरण कर लेते हैं। जीव अनादि हैं; जीव एवं भगवान् का सम्बन्ध भी अनादिकाल से चला आया है; इस अनादि प्राग्भाव के ध्वस्त हो जाने पर घट-पटादि की उत्पत्ति होती है। पूर्व-पूर्व भगवद्वरण से उत्तरोत्तर भगवदनुग्रह की प्राप्ति होती है, एतावता उभय में हेतुहेतुमद्भाव बन जाता है। पूर्ण भगवदनुकम्पावश ही जीव में भगवद्वरेण्य गुणगणों का आविर्भाव होता है। अस्तु, गोपांगनाएँ कह रही हैं हे मदन-मोहन! आप ही हमारे सुरत के प्रेरक हैं; आप ही ने हमसे सुरत की याच्ञा भी की; नायक द्वारा सुरत का याच्ञा करने पर नायिका की कामना भी उत्कट हो जाती है। अनन्त ब्रह्माण्ड-नायक परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र ने रासेश्वरी नित्यनिकुन्जेश्वरी, वृषभानुदुलारी राधारानी एवं उनकी परमान्तरंगा गोपांगनाओं से सुरतयाच्ञा की अतः उनमें भी उत्कट कामना उद्भूत हुई। इस उत्कट कामना को भी आप ही ने ‘वरदानेन दृढीकृता’ वरदान द्वारा दृढ़ीकृत किया है।

मर्यादापुरुषोत्तम राघवेन्द्र रामचन्द्र स्वरूप में भगवान् का आविर्भाव अयोध्या में हुआ। राजा दशरथ ने रामचन्द्र को युवराज-पद पर अभिषिक्त करने का अयोजन किया; ऋषियों और देवताओं के सम्मिलित षड्यन्त्र के कारण राघवेन्द्र रामचन्द्र के राज्य-सिंहासनारोहण का मंगल आयोजन सफल न हो सका; अपने पिता राजा दशरथ द्वारा कैकेयी को दिये गये वचनों का परिपालन करने हेतु राघवेन्द्र रामचन्द्र ने सम्पूर्ण राज्योचित श्रृंगार को त्यागकर जटा एवं वल्कल धारण कर वन की ओर प्रस्थान किया।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)

क्रमश:

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गोपी गीत

मर्यादापुरुषोत्तम रामचन्द्र के मुखारविन्द की शोभा, आभा, प्रभा, कान्ति सर्वथा अम्लान थी; ‘प्रसन्नतां या न गताऽभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।’सिंहासनारोहण समारोह को सुनकर जिसमें प्रसन्नता उद्भूत नहीं हुई और वनवास के कारण जिसमें म्लानता नहीं आई ऐसे अकृत्रिम, अचिन्त्य, अनन्त सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य, सौगन्ध्य-सुधा-जलानिधि भगवान् राघवेन्द्र रामचन्द्र के लोकोत्तर सौन्दर्य-माधुर्य पर मुग्ध हो, दण्डकारण्य-निवासी, वल्कलधारी, अब्भक्ष, वायुभक्ष, फलाशी ऋषि-महर्षिगण भी उनके आलिंगन के लिए अत्यन्त व्याकुल हो कह उठे ‘आलिंगायामो भगवन्तम्।’

मर्यादा-पुरुषोत्तम विग्रह में ऋषि-महर्षियों की इस अभिलाषा की पूर्ति असम्भव थी अतः भगवान् राघवेन्द्र रामचन्द्र ने उनको अपने लीला-विग्रह कृष्णावतान में स्वालिंगन-प्रदान का वरदान दिया। विष्णूपनिषद् का उल्लेख है कि भगवत्-स्वरूप-सम्मिलन के लिए उत्कण्ठित महर्षिगण ही भगवदादेशानुसार गोपाकन्याओं के रूप में उत्पन्न हुए। महाप्रलय-काल में भगवान् योग-निद्रा में विश्राम करते हैं; विश्व-रचना के पूर्व-ऋचाओं एवं मंत्रों की अधिष्ठात्री शक्तियाँ, श्रुतियाँ भगवान् से प्राकट्य हेतु प्रार्थना करती हैं। सूरदास कहते हैं ‘वेद ऋचा होइ गोपिका, हरि सौं किया बिहार।’ तात्पर्य कि विशेष भगवदनुकम्पावशात् ही उत्तम अधिकारियों में भगवद्-सम्मिलन सुख की उत्कट कामना जागरित होती है। सामान्यतः प्राणी लौकिक सुख-सम्भोग-कामना में ही लिप्त रहता है; ‘बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा’ बाह्य विषयों में जिसका अन्तःकरण असक्त हो गया है, जो वैषयिक सुख-सम्भोग से विरक्त हो गया है ऐसे प्राणी में भगवद्-सम्मिलन-सुख की उत्कट कामना उद्भूत होती है। श्रीमद्गीता-वाक्य है-

‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।’

अर्थात्, विषयेन्द्रिय प्रयोगजन्य सम्पूर्ण लौकिक सुख परिणामतः दुःखमय हैं अतः बुध प्राणी उनका त्याग कर ब्रह्म-रति की ही कामना करता है। ‘बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोग युक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।’ लौकिक विषयों से उपरत, आत्मरत, विवेकी ही ब्रह्म-सम्मिलन-सुख को प्राप्त कर सकते हैं। अस्तु, श्रीकृष्ण-स्वरूप-सम्मिलन की उत्कट कामनावश दण्डकारण्यवासी ऋषि-महर्षिगण एवं वेद-ऋचाओं ने गोप-कन्या रूप धारण किया।

‘गोपाल-चम्पू’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ में लिखा है कि जैसे आकाश में चन्द्रमा के उदय होते ही सरोवरस्थिता कुमुदिनी प्रफुल्लित हो उठती है वैसे ही नन्द भवन में परमानन्द आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र के आविर्भाव से गोपबालाएँ प्रफुल्लित हो उठीं। जन्मान्तर-संस्कारवशात् ये गोप-बालिकाएँ जन्म से ही कृष्णचन्द्रानुरागिणी हुईं; बाल्यकाल में ही उनके अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण एवं रोम-रोम कृष्णमय हो गये। जहाँ अंग-प्रत्यंग में सांग-श्यामांग समाविष्ट हों वहाँ अनंग-सन्निवेश का अवकाश ही कहाँ? श्रीकृष्ण-मिलन की अत्यन्त उत्कट कामना से वशीभूत हो इन गोप-कन्याओं ने कात्यायनी-अर्चन किया। भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए, गोप-कन्याओं के परिधान का हरण किया। जैसे प्रज्वलित काष्ठसमूह में निक्षिप्त काष्ठखण्ड में अग्नि स्वभावतः ही व्यक्त हो जाती है वैसे ही शुद्ध, निरावरण परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण से संस्पृष्ट परिधानों को धारण कर उन गोप-बालाओं ने अनायास ही ब्रह्म-संस्पर्श सुख का अनुभव किया; फलतः उनमें श्रीकृष्ण-सम्मिलन की उत्कट उत्कण्ठा का लोकोत्तर विकास हुआ।

गोपांगनाएँ कहती हैं, हे श्यामसुन्दर! आप ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धात्मक सम्पूर्ण सुख-सम्भोग के अधिपति हैं, आप ही हमारी सम्भोग-सुख-कामना के प्रेरक हैं और आप ही ने सम्भोग-सुख की याच्ञा कर हमारी कामना को अभिवृद्धिंगत किया है; कात्यायनी-व्रत प्रसंग से ‘मयेमारंस्यथ क्षपाः; इमा रात्रयः, क्षपाः हमा क्षपा मया रंस्यथः’ इन रात्रियों में तुम हमारे संग रमण करोगी; ऐसा वरदान देकर आपने ही हमारी कामनाओं को दृढ़ीभूत किया; आपके द्वारा वरदान में दी गयी वही अनन्त-सौन्दर्य-माधुर्य दिव्य ब्राह्म रात्रियाँ मूर्तिमती हो प्रत्यक्ष हो रही हैं; आप द्वारा प्रदत्त वरदान के कारण भी हे वरद! हम गोप-कन्याओं के लिए आपका प्राकट्य होना ही चाहिए।

‘एष उ भामनी शेभनानि कर्मफलानि नयनीति प्रापयतीति भामनी’; शोभन कर्मफलों को प्राप्त कराने वाला भगवान् ही भामनी है, भगवान् ही वामनी है, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् भगवान ही शुभाशुभ कार्य के फल-दाता हैं। प्रकृति जड़ है; अतः अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्तानन्त प्राणियों से तथा प्रत्येक प्राणी के अनेकानेक जन्म-कर्म से अज्ञ है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)

क्रमश:

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गोपी गीत

अत्यन्त अल्पज्ञ जीव स्वयं अपने ही अपरिगणित जन्म-कर्म से अनभिज्ञ है। फलतः प्रकृति एवं जीव दोनों ही कर्म-फल-दाता होने में समर्थ नहीं। स्वयं कर्म भी कर्म-फल-दाता होने में समर्थ नहीं। देह, मन, बुद्ध एवं अहंकार के विभिन्न क्रिया-कलाप ही कर्म हैं। अस्तु कर्म जड़ है अतः शास्त्रोक्त क्रिया-कलाप से अज्ञ हैं। परिशेषात् परमेश्वर प्रभु की एकमात्र कर्म-फल-दाता हैं तथापि स्वतन्त्र रूप से फल-दाता भी न होने के कारण वेषम्यदोष से सर्वथा मुक्त हैं। ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करे सा तस फल चाखा।’ अतः सापेक्ष कर्म की सार्थकता निर्विवाद है। एतावता शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धात्मक सम्पूर्ण लौकिक सुखों के भी प्रेरक भगवान् हैं तथा ब्रह्म-संस्पर्श की कामना के भी प्रेरक भगवान् ही हैं अतः स्वप्रकाश, सर्वाधिष्ठान प्रभु ही सम्पूर्ण रति के प्रेरक ‘सुरतनाथ’ हैं।

एका कथा है। कोई गोपांगना अपने सिर पर दही भरी मटकी रखे हुए सन्ध्या-वेला तक नन्द-भवन के चारों ओर डोलती रही; यह देख नन्दरानी ने उसको बुलाकर पूछा, “क्यों, सखी! क्या तुम्हारा दही नन्द-भवन में ही बिकता है? क्या तुम्हारे घर तुम ही एक सयानी हो?” अभी नन्दरानी गोपांगना को उलाहना दे ही रही थीं कि बालकृष्ण दौड़ते हुए आकर उससे लिपट गये; गोप-बाला कृतार्थ हो गयी। तात्पर्य कि गोपालियाँ निरन्तर श्रीकृष्ण में ही तन्मय रहती हैं। भक्तजन कहते हैं-

रत्नाकरस्तव गृहं, गृहिणी च पद्मा।
किं देयमस्ति भवते, भुवनेश्वराय।
आभीर-वाम-नयनाहृतमानसाय।
दत्तं मनो यदुपते! कृपया गृहाण।

अर्थात् हे प्रभो! अनन्तानन्त रत्नों का आकर, रत्नाकर क्षीर-समुद्र आपका निवास-स्थान है, ब्रह्माण्ड को अधिष्ठात्री महालक्ष्मी पद्मा आपकी गृहिणी है, आप स्वयं अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड के अधीश्वर हैं। हम आपको क्या दे सकते हैं? हे भगवान्! मैं अपना मन आपको समर्पित करता हूँ। आप मेरा मन ले लें क्योंकि आभीर-बालाओं ने आपके मन को चुरा लिया है। वेद-वाक्य है-

‘अप्राणोह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः।’

भगवान् अप्राण, अमना, शुभ्र एवं पर अक्षर से भी पर हैं। अमना भगवान् ने रास-क्रीड़ा हेतु ‘मनश्चक्र’ मन बनाया परन्तु गोपांगनाओं ने उस मन को भी चुरा लिया अतः हे प्रभो! मैं अपना मन ही आपको प्रदान करता हूँ। ‘भावप्रियो भगवान्’ अतः भक्त अपना मन भगवान् को समर्पित करके कृतकृत्य हो जाता है। अस्तु, आप्त-काम, पूर्ण-काम, परम-निष्काम आत्माराम प्रभु भी भक्तानुग्रहार्थ, भक्त-वांछा प्रदानार्थ अनाप्त-काम, सकाम ही कहीं नवनीत-चौर्य करते हैं तो कहीं नाच-नाचकर दधि याचना करते हैं तो कहीं सुरत-याचना करते हैं। भगवत् सम्मिलन-सुख की उत्कट उत्कण्ठा को उद्भूत कर देना ही ऐसी सम्पूर्ण लीलाओं को एकमात्र उद्देश्य है। ‘श्रीमुषादृशा’ गोपांगनाएँ कहती हैं, हे श्यामसुन्दर! आपने अपने निरतिशय सुन्दर तीक्ष्ण नेत्रों से हमें आहत किया है। इस दृशा-वध से हम संत्रस्त हैं। आपके नेत्रों ने शरद्कालीन, स्वच्छ, शीतल, अगाध जलाशय में उत्पन्न साधुजात-सरसिज-कर्णिकान्तर-निवासिनी-नवनवायमान श्री का हरण कर लिया; आशय कि आपके नेत्र-कमलों में तापनोदकता, शीतलता, सरसता, परमाह्लादकता एवं लोकोत्तर सौन्दर्यादि गुण-गण विद्यमान हैं तथापि हमारे लिए स्वभाववेपरीत्य हो गया है। ‘जारत विरहवंत नरनारी, विषसंयुत कर निकर पसारी।’ जैसे अमृत से परिपूर्ण होते हुए भी यह गरल-बन्धु चन्द्रमा विष-संयुत-तुल्य करनिकर को फैलाकर विरहवन्त नर-नारियों को जलाता है वैसे ही आप भी अपनी मंजुल-कोमल दृष्टि से हमारा दृशा-वध कर रहे हैं। श्रीमद्भागवत का कथन है-

‘आयुर्मनांसि च दृशा सह ओज आर्च्छत्।’

अर्थात् दृष्टि से ही शत्रुदल के वीरों के मन, तेज, बल एवं आयु को खींच लिया। वल्लभाचार्य कहते हैं कि वास्तव में प्रभु की दृष्टि ही सर्व-धातुकी है। श्रीमद्भागवत का कथन है कि भगवान् का अन्तररूप पुरुषरूप है तथा बाह्यरूप कालरूप है। भगवान् पुरुषरूप से सबके अमृतत्त्व के कारण एवं कालरूप से सबकी मृत्यु के कारण हैं। ‘पूर्षुशेते इति पुरुषः।’ अर्थात्, कीट-पंतंग, पशु-पक्षी, नर-नारी आदि विभिन्न शरीररूपी पुर में शयन करने वाला ही पुरुष है। सर्वद्रष्टा, सर्वसाक्षी, सर्वाधिष्ठान अन्तरात्मा पुरुषरूप से साक्षात्कृत होकर अमृतत्त्व प्रदान करते हैं।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)

क्रमश:

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गोपी गीत

परीक्षित कहते हैं-
‘वीर्याणि तस्याखिलदेहभाजामन्तर्बहिः पूरुषकालरूपै:।
प्रयच्छतो मृत्युमुतामृतं च मायामनुष्यस्य वदस्व विद्वन्।

जो पुरुषरूप से अमृतत्त्व देने वाले हैं और कालरूप से मृत्यु को देने वाले जो माया से मनुष्यवत् प्रतीत हो रहे हैं उनके दिव्य वीर्यों का वर्णन करो। भगवान् ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ (कठोपनिषद्) हैं, सकल विरुद्ध धर्माश्रय हैं। तैत्तिरीय उपनिष्द का कथन है 'तत्त्वेवभयं विदुषोऽमंवानस्य ‘स एव मविदितो न भुनक्ति’ जो विद्वान् भगवान् को प्रत्यक्ष चेतन्याभिन्न स्वरूप में नहीं देखता, जिसने अन्तरात्मा रूप में सर्वान्तरात्मा प्रभु का अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं किया उसके लिए वही देव अविदित होकर पालन नहीं करता अपितु ‘महद् भयं वज्त्रमुद्यतं’ उद्यत वज्र के तुल्य महत् भय का कारण बन जाता है।

‘भीषास्माद्वातः पवते भीषो देति सूर्यः।
भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पन्चमः।’

पवन, सूर्य तथा इन्द्र भी उससे भयभीत हो सदा गतिमान् रहते हैं; उसके भय से मृत्यु भी डरती है। ‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन।’ जिसने उसका साक्षात्कार कर लिया है, प्रत्यक्ष आत्मस्वरूप से जान लिया है उसके लिए भय का कोई कारण ही नहीं रह जाता, वह सबका आत्मा हो जाता है। अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत ब्रह्मादिदेव शिरोमणियों का आनन्द उस आनन्द का एक तुषार, एक कणमात्र है। ‘व्यापारवत् असाधारणं कारणं करणं’ जो व्यापारवान् होकर असाधारण कारण हो वही करण है। अस्तु, भिन्न-भिन्न इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न ज्ञान के असाधारण कारण अथवा करण हैं। करण कर्ताधीन है। अस्तु, करण में कर्ता के अनुकूल स्वभाव-वैपरीत्य भी हो जाता है। यही कारण है कि आपकी दृष्टि स्वभावतः अत्यन्त सुकुमार, सुन्दर, सरल, शीतल, मंजुल एवं आह्लादक होते हुए भी सर्वहारी एवं सर्वघात की हो रही है।

हे श्यामसुन्दर! आप कर्ता हैं, ‘स्वतन्त्रः कर्ता क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितः अर्थः’ जो क्रिया में स्वातन्त्र्येण विवक्षित है वही कर्ता है। आप पूर्णतः स्वतन्त्र हैं अतः आपमें स्वभाव-वैपरीत्य नहीं होना चाहिए। आप तो सुरतनाथ-शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धात्मक सम्पूर्ण सम्भोग के प्रेरक एवं दाता हैं, न कि छेदक; निश्चय ही, आप द्वारा सम्पूर्ण सम्भोग की प्राप्ति ही होनी चाहिए। वस्तुतः गोपांगनारूप श्रुतियाँ उपनिषद् के सिद्धान्तों को उपनिषद् की भाषा में ही कर रही हैं। भगवान् ही सम्पूर्ण कर्मफल-दाता हैं। अतः सुरतनाथ हैं।

श्रुति का कथन है, ‘तदैक्षत एकोऽहम् बहुस्याम्’ अर्थात् परमात्मा ने ईक्षण किया कि एक मैं बहुत हो जाऊँ। ईक्षण एवं अहं का यह उल्लेख अहं तत्त्व एवं महत् तत्त्व का द्योतक है। कार्य के निर्माण हेतु ज्ञान एवं अहंकार दोनों की ही आवश्यकता होती है। समष्टि-तत्त्व को बुद्धयारूढ़ करने के लिए प्रथम व्यष्टितत्त्व का ही अवलम्बन करना पड़ता हैं श्रुति का कथन है, ‘स एकाकी न रेमे’ अर्थात् एकाकी होने पर रमण, आनन्द नहीं होता। यही कारण है कि प्रतयक्ष वयष्टि जाग्रत् अवस्था एवं स्थूल शरीराभिमानी विश्व में समष्टि स्थूल प्रपन्चाभिमानी वैश्वानर की एवं स्वप्नावस्था तथा सूक्ष्म शरीराभिमानी प्राज्ञ में समष्टि अज्ञान-रूप कारण शरीराभिमानी कारण-ब्रह्मरूप अव्यक्त की दृष्टि कही गयी है। इससे विपरीत विराट् में विश्व-दृष्टि नहीं कही गयी क्योंकि समष्टि अप्रत्यक्ष है। जैसे सवल्प परिमाण वाले दीप्तिमान् अग्नि को देखकर अखण्ड ब्रह्माण्ड व्यापक दीप्तिमान् अग्नि की कल्पना की जाती है वैसे ही अनुभूत व्यष्टि अज्ञान, ज्ञान तथा अहंकार से समष्टि अज्ञान, महत्तत्त्व एवं अहंतत्त्व का भी बुद्धि में आरोहण होता है। समस्त तत्त्व क्रमशः परमात्मा से ही उत्पन्न होते हैं और परमात्मा में ही लीन भी हो जाते हैं।

सुषुप्ति में भी प्रपन्च का लय प्रतीत होता है। ‘सन्ने ग्रदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते’ सुषुप्ति-अवस्था में रहने वाला आत्मा ही ब्रह्म है। ‘यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे’ जो समष्टि ब्रह्माण्ड में होता है वही व्यष्टि पिण्ड में भी होता है। ‘मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम्। संभव सर्वभूतानां ततो भवति भारत।’ भगवान् ने अपनी जाया, सत-तम-रज की साम्यावस्था प्रकृतिरूप में गर्भाधान किया; अचेतन प्रकृति चिदाभास से युक्त होकर चेतित हो गयी। जैसे लोह-खण्ड अग्नि के सम्पर्क से अग्निमय हो जाता है वैसे ही जड़ प्रकृति भी चिदाभास साहचर्य से चिन्मयी हो गयी। तात्पर्य यह कि प्रकृति से ब्रह्म का सम्मिलन होने पर महत्तत्त्वादि क्रम से विश्वप्रपन्च की उत्पत्ति हुई। अस्तु, गोपांगनाएँ कह रही हैं, हे श्यामसुन्दर! आप ही सम्पूर्ण महासम्मिलन के प्रवर्तक हैं।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)

क्रमश:

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गोपी गीत

श्रीमद्भागवत-शब्द हैं ‘कामस्तु वासुदेवांशः’ काम वासुदेव भगवान् श्रीकृष्ण का अंश है अर्थात् पुत्र है। भगवान् श्रीकृष्ण साक्षान्मन्मथ हैं। देश-काल वस्तु-कृत परिच्छेद-रहित तत्त्व ही अनन्त ब्रह्म है; ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ तथापि जैसे स्वभावतः मधुर इक्षु-दण्ड के फल में लोकोत्तर माधुर्य अथवा मलयाचलोत्पन्न चन्दन-वृक्ष के पुष्प में लोकोत्तर सौरभ स्वाभाविक है वैसे ही तत्त्वज्ञ के अन्तःकरण पर अभिव्यक्त परब्रह्म के माधुर्यादि की अपेक्षा स्वयं अपनी ही परमाह्लादिनी लीला-शक्ति पर अभिव्यक्त भगवत्-स्वरूप के सौन्दर्य-माधुर्यादि अत्यन्त विलक्षण हैं। यही रस का विशेष उल्लास है।

जिस समय शुद्ध परब्रह्म अपनी अचिन्त्य लीला-शक्ति से कोटि-काम-कमनीय मनोहर श्रीकृष्णमूर्ति में प्रादुर्भूत हुआ उस समय प्रपंचातीत प्रत्यागभिन्न परमात्म-तत्त्व में निष्ठा रखने वाले मुनीन्द्र-योगीन्द्र के मन भी अनायास उस भगवन्मूर्ति की ओर आकृष्ट हो गये। जिस प्रकार सूर्य को दूरवीक्षण यन्त्र द्वारा देखने पर उसमें जो विचित्रता प्रतीत होती है वह केवल नेत्रों से देखने पर प्रतीत नहीं होती उसी प्रकार लीलाशक्त्युपहित सगुण ब्रह्म-दर्शन में जो आनन्दानुभव होता है वह अशेष-विशेष-शून्य शुद्ध परब्रह्म के साक्षात्कार में भी नहीं होता।

ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा, उभय वेष धरि की सोइ आवा।
सहज विराग रूप मन मोरा, थकित होत जिमि चन्द-चकोरा।
इनहिं विलोकत अति अनुरागा, बरबस ब्रह्म सुखहिं मन त्यागा।

अथवा,
यावन्निरन्जनमजं पुरुषं जरन्तम् सन्चिन्यामि सकले जगति स्फुरन्तम्।
तावत् बलात् स्फुरति हन्त! हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरन्जनपुन्जमन्जुः।

अथवा,
क्लेशे क्रमात् पन्चविधे क्षयं गतेयद् ब्रह्म सौख्यं स्वयमस्फुरत् परम्।
तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते।

इत्यादि सहस्रों वचन इस प्रकार के हैं जिनसे यह सुस्पष्ट हो जाता है कि निराकार, निर्विकार, सच्चिदानन्द परात्पर परब्रह्म में पूर्णतः परिनिष्ठित, आत्मकाम, पूर्णकाम, परमनिष्काम, आत्माराम ब्रह्मविद्वरिष्ठ जन भी सगुण, साकार व्रजेन्द्र-नन्दन श्रीकृष्णचन्द्र का साक्षात्कार कर उस मधुर, मनोहर, मंगलमय मूर्ति में तन्मय हो गये; यही रसोल्लास का चमत्कार है।

जैसे, ज्वार आने पर समुद्र उद्वेलित हो जाता है उसी प्रकार अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्ति के योग से सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पूर्णतम पुरुष में जब विशेष रूप से रसोल्लास होता है तब वही रस-महासमुद्र होकर उद्वेलित हो उठता है। इस उद्वेलित रस-महासमुद्र का अत्यन्त अद्भुत चमत्कार है। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के मुखचन्द्र के माधुर्यामृत का, श्रीअंग के लावण्यामृत का तथा पारादविन्द के सौगन्ध्यामृत का रसास्वादन आदि सम्पूर्ण उसी उच्चकोटि के सम्भोग के अन्तर्गत आते हैं। यही कामरूप तृतीय पुरुषार्थ है। बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार ‘स एकाकी न रेमे- अतः ‘द्वितीयम् ऐच्छत्’ और स्वयं ही दो विभिन्न रूपों में प्रादुर्भूत हुआ, ‘एकं ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम्’ एक ही ज्योति राधा और माधव दो रूपों में प्रादुर्भूत हुई। त्रिपुरा-रहस्य सिद्धान्तानुसार वहीं एक ज्योति राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी भगवती जगज्जननी कामेश्वरी पराम्बा ललिता एवं राजराजेश्वर कामेश्वर स्वरूप में प्रादुर्भूत हुई। बृहदारण्यक में प्राप्त शतरूपा एवं मनु की कथा इसी भाव की द्योतक है; शतरूपा ने क्रमेण अनेक रूप धारण किये; मनु भी क्रमेण तत् तत् रूप धारण करते गये। पूर्णानुराग समुद्भूत सरोज ही व्रजधाम है; इस केशर का पराग है आनन्दकन्द, परमानन्द श्रीकृष्णचन्द्र और इस पराग की मकरन्द रस हैं श्री रासेश्वरी, नित्य-निकुन्जेश्वरी राधा-रानी। अतः एक ही रस, सरोज-स्वरूपही ज्योति राधा और माधव दो रूपों में प्रादुर्भूत हुई।

‘त्रिपुरा-रहस्य’ सिद्धान्तानुसार वहीं एक ज्योति राजराजेश्वरी वृन्दावन धाम, सरोज केशरस्वरूप अनन्तान्त गोपांगनाएँ, केशर (पराग) स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र एवं पराग-मकरन्द-रसस्वरूप राधारानी आदि विभिन्न रस-स्वरूपों में उल्लसित हुआ; इस सब रसों में वृन्दावन धाम ही मुख्य है; श्रीमद् व्रजधाम स्वयं ही महान् रस है, यमुना साक्षात् अनुराग-द्रव है, गोवर्धन पर्वत साक्षात् प्रेम-पुन्ज है, इसी तरह राधा-कुण्ड, कृष्ण-सरोवर आदि भी रसविशिष्ट ही हैं तथापि उनके तत् स्वरूप का दर्शन विशिष्ट भगवदनुगृहीत व्यक्तियों को ही हो सकता है।

इसी तरह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र तथा राधारानी एवं गोपांगनाओं के सम्पूर्ण हास-विलास-परिहास भी विभिन्न रस ही हैं; उपर्युक्त सम्पूर्ण रसों का समूह ही रास है ‘रसानां समूहो रासः।’ इस रस-समूह में भी सावरण एवं निरावरण दो भेद हैं। वस्तुतः निरावरण में भी लीलाहेतु स्वेच्छया वैष्णवी-माया द्वारा ब्रह्मस्वरूप समावृत हो जाता है परन्तु वैष्णवीमाया द्वारा लीला-विशेष-विकास-हेतु उपयोगी भेद का ही स्फुरण होता है। ‘अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः’ अपने पुत्र बालकृष्ण के मुख में सम्पूर्ण विश्व-प्रपन्च का दर्शन कर यशोदा रानी को भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य स्वरूप का प्रबोध हो गया। वे विचार करने लगीं, ‘अरे! यह तो सर्वाधिष्ठान, सर्व-शक्तिमान्, सर्वेश्वर, अनन्तकोटि-ब्रह्माण्ड-नायक प्रभु हैं और मैं अत्यन्त तुच्छ मोहग्रसिता नारी इनको अपना पुत्र मानकर छड़ी दिखा रही हूँ।’ भयभीता माता के प्रकम्पित हाथों से छड़ी छूट गई। अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड की ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी भगवान् श्रीमन्नारायण श्रीकृष्ण की सेवा के उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में सतत व्रज का आश्रयण करती हैं। बालक कृष्ण को माता की छड़ी से भयभीत होते देखकर ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी को अवसर प्राप्त हो गया; ऐश्वर्याधिष्ठात्री शक्ति के प्राकट्य से बालक कृष्ण के मुख में सम्पूर्ण विश्व-प्रपन्च प्रतिभासित हो उठा।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:

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