Monday, 28 January 2019

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गोपी गीत

अत्यन्त अल्पज्ञ जीव स्वयं अपने ही अपरिगणित जन्म-कर्म से अनभिज्ञ है। फलतः प्रकृति एवं जीव दोनों ही कर्म-फल-दाता होने में समर्थ नहीं। स्वयं कर्म भी कर्म-फल-दाता होने में समर्थ नहीं। देह, मन, बुद्ध एवं अहंकार के विभिन्न क्रिया-कलाप ही कर्म हैं। अस्तु कर्म जड़ है अतः शास्त्रोक्त क्रिया-कलाप से अज्ञ हैं। परिशेषात् परमेश्वर प्रभु की एकमात्र कर्म-फल-दाता हैं तथापि स्वतन्त्र रूप से फल-दाता भी न होने के कारण वेषम्यदोष से सर्वथा मुक्त हैं। ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करे सा तस फल चाखा।’ अतः सापेक्ष कर्म की सार्थकता निर्विवाद है। एतावता शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धात्मक सम्पूर्ण लौकिक सुखों के भी प्रेरक भगवान् हैं तथा ब्रह्म-संस्पर्श की कामना के भी प्रेरक भगवान् ही हैं अतः स्वप्रकाश, सर्वाधिष्ठान प्रभु ही सम्पूर्ण रति के प्रेरक ‘सुरतनाथ’ हैं।

एका कथा है। कोई गोपांगना अपने सिर पर दही भरी मटकी रखे हुए सन्ध्या-वेला तक नन्द-भवन के चारों ओर डोलती रही; यह देख नन्दरानी ने उसको बुलाकर पूछा, “क्यों, सखी! क्या तुम्हारा दही नन्द-भवन में ही बिकता है? क्या तुम्हारे घर तुम ही एक सयानी हो?” अभी नन्दरानी गोपांगना को उलाहना दे ही रही थीं कि बालकृष्ण दौड़ते हुए आकर उससे लिपट गये; गोप-बाला कृतार्थ हो गयी। तात्पर्य कि गोपालियाँ निरन्तर श्रीकृष्ण में ही तन्मय रहती हैं। भक्तजन कहते हैं-

रत्नाकरस्तव गृहं, गृहिणी च पद्मा।
किं देयमस्ति भवते, भुवनेश्वराय।
आभीर-वाम-नयनाहृतमानसाय।
दत्तं मनो यदुपते! कृपया गृहाण।

अर्थात् हे प्रभो! अनन्तानन्त रत्नों का आकर, रत्नाकर क्षीर-समुद्र आपका निवास-स्थान है, ब्रह्माण्ड को अधिष्ठात्री महालक्ष्मी पद्मा आपकी गृहिणी है, आप स्वयं अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड के अधीश्वर हैं। हम आपको क्या दे सकते हैं? हे भगवान्! मैं अपना मन आपको समर्पित करता हूँ। आप मेरा मन ले लें क्योंकि आभीर-बालाओं ने आपके मन को चुरा लिया है। वेद-वाक्य है-

‘अप्राणोह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः।’

भगवान् अप्राण, अमना, शुभ्र एवं पर अक्षर से भी पर हैं। अमना भगवान् ने रास-क्रीड़ा हेतु ‘मनश्चक्र’ मन बनाया परन्तु गोपांगनाओं ने उस मन को भी चुरा लिया अतः हे प्रभो! मैं अपना मन ही आपको प्रदान करता हूँ। ‘भावप्रियो भगवान्’ अतः भक्त अपना मन भगवान् को समर्पित करके कृतकृत्य हो जाता है। अस्तु, आप्त-काम, पूर्ण-काम, परम-निष्काम आत्माराम प्रभु भी भक्तानुग्रहार्थ, भक्त-वांछा प्रदानार्थ अनाप्त-काम, सकाम ही कहीं नवनीत-चौर्य करते हैं तो कहीं नाच-नाचकर दधि याचना करते हैं तो कहीं सुरत-याचना करते हैं। भगवत् सम्मिलन-सुख की उत्कट उत्कण्ठा को उद्भूत कर देना ही ऐसी सम्पूर्ण लीलाओं को एकमात्र उद्देश्य है। ‘श्रीमुषादृशा’ गोपांगनाएँ कहती हैं, हे श्यामसुन्दर! आपने अपने निरतिशय सुन्दर तीक्ष्ण नेत्रों से हमें आहत किया है। इस दृशा-वध से हम संत्रस्त हैं। आपके नेत्रों ने शरद्कालीन, स्वच्छ, शीतल, अगाध जलाशय में उत्पन्न साधुजात-सरसिज-कर्णिकान्तर-निवासिनी-नवनवायमान श्री का हरण कर लिया; आशय कि आपके नेत्र-कमलों में तापनोदकता, शीतलता, सरसता, परमाह्लादकता एवं लोकोत्तर सौन्दर्यादि गुण-गण विद्यमान हैं तथापि हमारे लिए स्वभाववेपरीत्य हो गया है। ‘जारत विरहवंत नरनारी, विषसंयुत कर निकर पसारी।’ जैसे अमृत से परिपूर्ण होते हुए भी यह गरल-बन्धु चन्द्रमा विष-संयुत-तुल्य करनिकर को फैलाकर विरहवन्त नर-नारियों को जलाता है वैसे ही आप भी अपनी मंजुल-कोमल दृष्टि से हमारा दृशा-वध कर रहे हैं। श्रीमद्भागवत का कथन है-

‘आयुर्मनांसि च दृशा सह ओज आर्च्छत्।’

अर्थात् दृष्टि से ही शत्रुदल के वीरों के मन, तेज, बल एवं आयु को खींच लिया। वल्लभाचार्य कहते हैं कि वास्तव में प्रभु की दृष्टि ही सर्व-धातुकी है। श्रीमद्भागवत का कथन है कि भगवान् का अन्तररूप पुरुषरूप है तथा बाह्यरूप कालरूप है। भगवान् पुरुषरूप से सबके अमृतत्त्व के कारण एवं कालरूप से सबकी मृत्यु के कारण हैं। ‘पूर्षुशेते इति पुरुषः।’ अर्थात्, कीट-पंतंग, पशु-पक्षी, नर-नारी आदि विभिन्न शरीररूपी पुर में शयन करने वाला ही पुरुष है। सर्वद्रष्टा, सर्वसाक्षी, सर्वाधिष्ठान अन्तरात्मा पुरुषरूप से साक्षात्कृत होकर अमृतत्त्व प्रदान करते हैं।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)

क्रमश:

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