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गोपी गीत
मर्यादापुरुषोत्तम रामचन्द्र के मुखारविन्द की शोभा, आभा, प्रभा, कान्ति सर्वथा अम्लान थी; ‘प्रसन्नतां या न गताऽभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।’सिंहासनारोहण समारोह को सुनकर जिसमें प्रसन्नता उद्भूत नहीं हुई और वनवास के कारण जिसमें म्लानता नहीं आई ऐसे अकृत्रिम, अचिन्त्य, अनन्त सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य, सौगन्ध्य-सुधा-जलानिधि भगवान् राघवेन्द्र रामचन्द्र के लोकोत्तर सौन्दर्य-माधुर्य पर मुग्ध हो, दण्डकारण्य-निवासी, वल्कलधारी, अब्भक्ष, वायुभक्ष, फलाशी ऋषि-महर्षिगण भी उनके आलिंगन के लिए अत्यन्त व्याकुल हो कह उठे ‘आलिंगायामो भगवन्तम्।’
मर्यादा-पुरुषोत्तम विग्रह में ऋषि-महर्षियों की इस अभिलाषा की पूर्ति असम्भव थी अतः भगवान् राघवेन्द्र रामचन्द्र ने उनको अपने लीला-विग्रह कृष्णावतान में स्वालिंगन-प्रदान का वरदान दिया। विष्णूपनिषद् का उल्लेख है कि भगवत्-स्वरूप-सम्मिलन के लिए उत्कण्ठित महर्षिगण ही भगवदादेशानुसार गोपाकन्याओं के रूप में उत्पन्न हुए। महाप्रलय-काल में भगवान् योग-निद्रा में विश्राम करते हैं; विश्व-रचना के पूर्व-ऋचाओं एवं मंत्रों की अधिष्ठात्री शक्तियाँ, श्रुतियाँ भगवान् से प्राकट्य हेतु प्रार्थना करती हैं। सूरदास कहते हैं ‘वेद ऋचा होइ गोपिका, हरि सौं किया बिहार।’ तात्पर्य कि विशेष भगवदनुकम्पावशात् ही उत्तम अधिकारियों में भगवद्-सम्मिलन सुख की उत्कट कामना जागरित होती है। सामान्यतः प्राणी लौकिक सुख-सम्भोग-कामना में ही लिप्त रहता है; ‘बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा’ बाह्य विषयों में जिसका अन्तःकरण असक्त हो गया है, जो वैषयिक सुख-सम्भोग से विरक्त हो गया है ऐसे प्राणी में भगवद्-सम्मिलन-सुख की उत्कट कामना उद्भूत होती है। श्रीमद्गीता-वाक्य है-
‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।’
अर्थात्, विषयेन्द्रिय प्रयोगजन्य सम्पूर्ण लौकिक सुख परिणामतः दुःखमय हैं अतः बुध प्राणी उनका त्याग कर ब्रह्म-रति की ही कामना करता है। ‘बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोग युक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।’ लौकिक विषयों से उपरत, आत्मरत, विवेकी ही ब्रह्म-सम्मिलन-सुख को प्राप्त कर सकते हैं। अस्तु, श्रीकृष्ण-स्वरूप-सम्मिलन की उत्कट कामनावश दण्डकारण्यवासी ऋषि-महर्षिगण एवं वेद-ऋचाओं ने गोप-कन्या रूप धारण किया।
‘गोपाल-चम्पू’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ में लिखा है कि जैसे आकाश में चन्द्रमा के उदय होते ही सरोवरस्थिता कुमुदिनी प्रफुल्लित हो उठती है वैसे ही नन्द भवन में परमानन्द आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र के आविर्भाव से गोपबालाएँ प्रफुल्लित हो उठीं। जन्मान्तर-संस्कारवशात् ये गोप-बालिकाएँ जन्म से ही कृष्णचन्द्रानुरागिणी हुईं; बाल्यकाल में ही उनके अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राण एवं रोम-रोम कृष्णमय हो गये। जहाँ अंग-प्रत्यंग में सांग-श्यामांग समाविष्ट हों वहाँ अनंग-सन्निवेश का अवकाश ही कहाँ? श्रीकृष्ण-मिलन की अत्यन्त उत्कट कामना से वशीभूत हो इन गोप-कन्याओं ने कात्यायनी-अर्चन किया। भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए, गोप-कन्याओं के परिधान का हरण किया। जैसे प्रज्वलित काष्ठसमूह में निक्षिप्त काष्ठखण्ड में अग्नि स्वभावतः ही व्यक्त हो जाती है वैसे ही शुद्ध, निरावरण परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण से संस्पृष्ट परिधानों को धारण कर उन गोप-बालाओं ने अनायास ही ब्रह्म-संस्पर्श सुख का अनुभव किया; फलतः उनमें श्रीकृष्ण-सम्मिलन की उत्कट उत्कण्ठा का लोकोत्तर विकास हुआ।
गोपांगनाएँ कहती हैं, हे श्यामसुन्दर! आप ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धात्मक सम्पूर्ण सुख-सम्भोग के अधिपति हैं, आप ही हमारी सम्भोग-सुख-कामना के प्रेरक हैं और आप ही ने सम्भोग-सुख की याच्ञा कर हमारी कामना को अभिवृद्धिंगत किया है; कात्यायनी-व्रत प्रसंग से ‘मयेमारंस्यथ क्षपाः; इमा रात्रयः, क्षपाः हमा क्षपा मया रंस्यथः’ इन रात्रियों में तुम हमारे संग रमण करोगी; ऐसा वरदान देकर आपने ही हमारी कामनाओं को दृढ़ीभूत किया; आपके द्वारा वरदान में दी गयी वही अनन्त-सौन्दर्य-माधुर्य दिव्य ब्राह्म रात्रियाँ मूर्तिमती हो प्रत्यक्ष हो रही हैं; आप द्वारा प्रदत्त वरदान के कारण भी हे वरद! हम गोप-कन्याओं के लिए आपका प्राकट्य होना ही चाहिए।
‘एष उ भामनी शेभनानि कर्मफलानि नयनीति प्रापयतीति भामनी’; शोभन कर्मफलों को प्राप्त कराने वाला भगवान् ही भामनी है, भगवान् ही वामनी है, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् भगवान ही शुभाशुभ कार्य के फल-दाता हैं। प्रकृति जड़ है; अतः अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्तानन्त प्राणियों से तथा प्रत्येक प्राणी के अनेकानेक जन्म-कर्म से अज्ञ है।
(गोपी गीत- करपात्रीजी महाराज)
क्रमश:
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