Sunday, 10 December 2017

रासलीला रहस्य 1

रासलीला-रहस्य
भाग- 1

“भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः,
वीक्ष्य रन्तुं मनश्च के योगमायामुपाश्रितः”

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में 29 से 33 वें अध्याय तक भगवान की रासलीला का प्रसंग है। इसी को रास पंचाध्यायी कहते हैं। इस रास पंचाध्यायी में श्रीमद्भागवत वर्णित तत्त्वों के सारभूत परम तत्त्व का परमाज्ज्वल प्रकाश है। ये पाँच अध्याय वस्तुतः श्रीमद्भागवत के पंचप्राण-स्वरूप हैं। भगवान की दिव्य लीला का भाव न समझकर केवल बाह्य दृष्टि से देखने पर यह सारी कथा श्रृंगार-रसपूर्ण दिखायी दे सकती है और इससे मनुष्य भ्रम ग्रस्त हो सकता है। इसी से सम्भवतः श्रीशुकदेवजी ने उपर्युक्त प्रथम श्लोक में प्रथम शब्द ‘भगवान’ दिया है, जिससे पढ़ने वाला व्यक्ति इसे भगवान की लीला समझकर ही पढ़े। वस्तुतः यह लौकिक काम-प्रसंग कदापि नहीं है।

इसके श्रोता हैं विवेक वैराग्य सम्पन्न, मुमुक्षु, धर्मज्ञानपूर्ण, मरण की प्रतीक्षा करने वाले महाराज परीक्षित और वक्ता हैं ब्रह्माविद्वरिष्ठ परम योगी जीवन्मुक्त सर्वऋषिमुनिमान्य श्रीशुकदेवजी। ऐसे वक्ता श्रोता लौकिक श्रृंगार की बातें कहें सुनें, यह सोचना ही भूल है।

वस्तुतः इन पाँच अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण की परम दिव्य अन्तरंग लीला का, निजस्वरूपभूता, महाभावरूपा ह्लादिनीशक्ति श्रीराधाजी तथा उन्हीं का कायव्यूहरूपा दिव्य कृष्णप्रेममयी गोपांगनाओं के साथ होने वाली भगवान की रसमयी लीला का वर्णन है। ‘रास’ शब्द का मूल ‘रस’ है और ‘रस’ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही हैं।

‘रसो वै सः’
जिस दिव्य क्रीडा में एक ही रस अनेक रसों के रूप में होकर अनन्त-अनन्त रस का समास्वादन करे, एक रस ही रस-समूह के रूप में प्रकट होकर स्वयं ही आस्वाद-आस्वादक, लीला, धाम और विभिन्न आलम्बन एंव उद्दीपन के रूप में क्रीडा करे-उसका नाम ‘रास’ है। अतएव यह रासलीला भी लीलामय भगवान का ही स्वरूप है। भगवान की यह दिव्य लीला भगवान के दिव्य धाम में दिव्यरूप से निरन्तर हुआ करती है।
(साभार श्री राधामाधव चिंतन से)

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रास लीला रहस्य
भाग- 2

भगवान की विशेष कृपा से प्रेमी साधकों के हितार्थ कभी-कभी यह अपने दिव्य धाम के साथ ही भूमण्डल पर भी अवतीर्ण हुआ करती है, जिसको देख सुन एवम् गाकर तथा स्मरण-चिन्तन करके अधिकारी पुरुष रसस्वरूप भगवान की इस परम रसमयी लीला का आनन्द ले सकें और स्वयं भी भगवान की लीला में सम्मिलित होकर अपने को कृतकृत्य कर सकें।

इस पंचाध्यायी में वंशीध्वनि, गोपियों के अभिसार, श्रीकृष्ण के साथ उनकी बातचीत, दिव्य रमण, श्रीराधाजी के साथ अन्तर्धान, पुनः प्राकट्‌य, गोपियों के द्वारा दिये हुए वसनासन पर विराजना, गोपियों के कूट प्रश्न का उत्तर, रास, नृत्य, क्रीडा, जलकेलि और वन-विहार का वर्णन है जो मानवी भाषा में होने पर भी वस्तुतः परम दिव्य है।

यह बात पहले ही समझ लेनी चाहिये कि भगवान का शरीर जीव-शरीर की भाँति जड़ नहीं होता। जड़ की सत्ता केवल जीव की दृष्टि में होती है, भगवान की दृष्टि में नहीं। यह देह है और यह देही है, इस प्रकार का भेदभाव केवल प्रकृति के राज्य में होता है। अप्राकृत लोक में जहाँ की प्रकृति भी चिन्मय है-सब कुछ चिन्मय ही होता है वहाँ अचित् की प्रतीति तो केवल चिद्विलास अथवा भगवान की लीला की सिद्धि के लिये होता है। इसलिये स्थूलता में या यों कहिये कि जड़ राज्य में रहने वाला मस्तिष्क जब भगवान की अप्राकृत लीलाओं के सम्बन्ध में विचार करने लगता है, तब वह अपनी पूर्व वासनाओं के अनुसार जड़ राज्य की धारणाओं, कल्पनाओं और क्रियाओं का ही आरोप उस दिव्य राज्य के विषय में भी करता है, इसलिये दिव्यलीला के रहस्य को समझने में असमर्थ हो जाता है।

यह रास वस्तुतः परम उज्ज्वल रस का एक दिव्य प्रकाश है। जड़ जगत् की बात तो दूर रही, ज्ञानरूप या विज्ञानरूप जगत् में भी यह प्रकट नहीं होता। अधिक क्या, साक्षात चिन्मय तत्त्वों में भी इस परम दिव्य उज्ज्वल रस का लेशाभास नहीं देखा जाता। इस परम रस की स्फूर्ति तो परम भावमयी श्रीकृष्णप्रेमस्वरूपा गोपीजनों के मधुर हृदय में ही होता है। इस रासलीला के यथार्थ स्वरूप और परम माधुर्य का आस्वाद उन्हीं को मिलता है, दूसरे लोग तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।
(साभार श्री राधामाधव चिंतन से)

क्रमश:

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रासलीला रहस्य
भाग- 3

भगवान के समान ही गोपियाँ भी परमरसमयी और सच्चिदानन्दमयी ही हैं। महारास में सम्मिलित गोपियाँ कोई साधारण नारियाँ नही, अपितु वेद की ऋचाऐं (वेद की एक लाख ऋचाऐं हैं जिनमें 80 हजार कर्मकांड, 16 हजार उपासना कांड और चार हजार ज्ञान कांड की हैं), दण्डक वन के ऋषि, आसुरी कन्यायें एवं प्रभु के वे भक्त जिन्होंने प्रभु की,कई कई जन्मों तक,युगों युगों तक कठिन अराधना कर गोपियों की देह प्राप्त की।

साधना की दृष्टि से भी उन्होंने न केवल जड़ शरीर का ही त्याग कर दिया है, बल्कि सूक्ष्मशरीर से प्राप्त होने वाले स्वर्ग, कैवल्य से अनुभव होने वाले मोक्ष और तो क्या, जड़ता की दृष्टि का ही त्याग कर दिया है। उनकी दृष्टि में केवल चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण हैं, उनके हृदय में श्रीकृष्ण को तृप्त करने वाला प्रेमामृत है। उनकी इस अलौकिक स्थिति में स्थूल शरीर, उसकी स्मृति और उसके सम्बन्ध से होने वाले अंग-संग की कल्पना किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती। ऐसी कल्पना तो केवल देहात्मबुद्धि से जकड़े हुए जीवों की ही होती है। जिन्होंने गोपियों को पहचाना है, उन्होंने गोपियों की चरणधूलि का स्पर्श प्राप्त करके अपनी कृतकृत्यता चाही है।

ब्रह्मा, शंकर, उद्धव और अर्जुन ने गोपियों की उपासना करके भगवान के चरणों में वैसे प्रेम का वरदान प्राप्त किया है या प्राप्त करने की अभिलाषा की है। उन गोपियों के दिव्य भाव को साधारण स्त्री-पुरुष के भाव जैसा मानना गोपियों के प्रति, भगवन् के प्रति और वास्तव में सत्य के प्रति महान अन्याय एंव अपराध है। इस अपराध से बचने के लिये भगवान की दिव्य लीलाओं पर विचार करते समय उनकी अप्राकृत दिव्यता का स्मरण रखना परमावश्यक है।

भगवान का चिदानन्दघन शरीर दिव्य है। वह अजन्ता और अविनाशी है, हानोपादानरहित है। वह नित्य सनातन शुद्ध भगवत्स्वरूप हैं।
(साभार श्री राधामाधव चिंतन से)

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भाग- 4

भगवान का चिदानन्दघन शरीर दिव्य है। वह अजन्ता और अविनाशी है, हानोपादानरहित है। वह नित्य सनातन शुद्ध भगवत्स्वरूप ही है। इसी प्रकार गोपियाँ दिव्य जगत् की भगवान की स्वरूपभूता अन्तरंग-शक्तियाँ हैं। इन दोनों का सम्बन्ध भी दिव्य ही है। यह उच्चतम भावराज्य की लीला स्थूल शरीर और स्थूल मन से परे है। आवरण भंग के अनन्तर जब भगवान स्वीकृति देते हैं, तब इसमें प्रवेश होता है। प्राकृत देह का निर्माण होता है स्थूल, सूक्ष्म और कारण-इन तीन देहों के संयोग से। जब तक ‘कारण-शरीर’ रहता है, तब तक इस प्राकृत देह से जीव को छुटकारा नहीं मिलता।

‘कारण-शरीर’ कहते हैं पूर्वकृत कर्मों के उन संस्कारों को, जो देह-निर्माण में कारण होते हैं।
इस ‘कारण-शरीर’ के आधार पर जीव को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ना होता है और यह चक्र जीव की मुक्ति न होने तक अथवा ‘कारण’ का सर्वथा अभाव न होने तक चलता ही रहता है। इसी कर्मबन्धन के कारण पांचभौतिक स्थूलशरीर मिलता है-जो रक्त, मांस, अस्थि, मेद, मज्जा आदि से भरा और चमड़े से ढका होता है।ये सभी प्राकृत शरीर हैं। इसी प्रकार योगियों के द्वारा निर्मित ‘निर्माणकाय’ यद्यपि अपेक्षाकृत शुद्ध है, तथापि वे भी हैं प्राकृत ही हैं।

पितर या देवों के दिव्य कहलाने वाले शरीर भी प्राकृत ही हैं। अप्राकृत शरीर इन सबसे विलक्षण हैं, जो महाप्रलय में भी नष्ट नहीं होते और भगवद्देह तो साक्षात भगवत्स्वरूप ही है। देव शरीर प्रायः रक्त मांस मेद अस्थि वाले नहीं होते। अप्राकृत शरीर भी नहीं होते। फिर भगवान श्रीकृष्ण का भगवत्स्वरूप शरीर तो रक्त मांस अस्थिमय होता ही कैसे। वह तो सर्वथा चिदानन्दमय है। उसमें देह-देही, गुण-गुणी, रूप-रूपी, नाम-नामी और लीला तथा लीलापुरुषोत्तम का भेद नहीं है।
(साभार श्री राधामाघव चिंतन से)

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भाग- 5

श्रीकृष्ण का एक एक अंग सम्पूर्ण श्रीकृष्ण है श्रीकृष्ण का मुखमण्डल जैसे पूर्ण श्रीकृष्ण है, वैसे ही श्रीकृष्ण का पदनख भी पूर्ण श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण की सभी इन्द्रियों से सभी काम हो सकते हैं। उनके कान देख सकते हैं, उनकी आँखें सुन सकती हैं, उनकी नाक स्पर्श कर सकती है, उनकी रसना सूँघ सकती है, उनकी त्वचा स्वाद ले सकती है। वे हाथों से देख सकते हैं, आँखों से चल सकते हैं। श्रीकृष्ण का सब कुछ श्रीकृष्ण होने के कारण वह सर्वथा पूर्णतम हैं।इसी से उनकी रूपमाधुरी नित्यवर्द्धनशील, नित्य नवीन सौन्दर्यमयी है। उसमें ऐसा चमत्कार है कि वह स्वयं अपने को ही आकर्षित कर लेते हैं फिर उनके सौन्दर्य माधुर्य से गौ हरिण और वृक्ष, बेल पुलकित हो जायँ इसमें तो कहना ही क्या है।

इसलिये उससे प्राकृत पांचभौतिक शरीरों वाले स्त्री-पुरुषों के रमण या मैथुन की कल्पना भी नहीं हो सकती। इसीलिये भगवान को उपनिषद् में ‘अखण्ड ब्रह्मचारी’ बतलाया गया है और इसी से भागवत में उनके लिये ‘अवरुद्ध सौरत’ आदि शब्द आये हैं।
फिर भी कोई शंका करे कि उनके सोलह हजार एक सौ साठ रानियों के इतने पुत्र कैसे हुए तो इसका सीधा उत्तर यही है कि यह सारी भागवती सृष्टि थी, भगवान के संकल्प से हुई थी। भगवान के शरीर में जो रक्त, मांस आदि दिखलायी पड़ते हैं, वह तो भगवान की योगमाया का चमत्कार है। इस विवेचन से भी यही सिद्ध होता है कि गोपियों के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जो रमण हुआ, वह सर्वथा दिव्य भगवत्-राज्य की लीला है, लौकिक काम-क्रीडा नहीं।
(साभार श्री राधामाधव चिंतन से)

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भाग- 6

उन गोपियों की साधना पूर्ण हो चुकी है। भगवान ने अगली रात्रियों में उनके साथ विहार करने का प्रेम संकल्प कर लिया है। इसी के साथ उन गोपियों को भी जो नित्यसिद्धा हैं, जो लोक दृष्टि में विवाहिता भी हैं, इन्हीं रात्रियों में दिव्य-लीला में सम्मिलित करना है। वे अगली रात्रियाँ कौन-सी हैं यह बात भगवान की दृष्टि के सामने है। उन्होंने शारदीय रात्रियों को देखा।

‘भगवान ने देखा’-इसका अर्थ सामान्य नहीं, विशेष है। जैसे सृष्टि के प्रारम्भ में ‘स ऐक्षत एकोऽहं बहु स्याम।’-भगवान के इस ईक्षण से जगत् की उत्पत्ति होती है, वैसे ही रास के प्रारम्भ में भगवान के प्रेम-वीक्षण से शरत्काल की दिव्य रात्रियों की सृष्टि होती है।

मल्लिका-पुष्प, चन्द्रिका आदि समस्त उद्दीपन सामग्री भगवान के द्वारा वीक्षित है अर्थात् लौकिक नहीं, अलौकिक-अप्राकृत है। गोपियों ने अपना मन श्रीकृष्ण के मन में मिला दिया था। उनके पास स्वयं मन न था। अब प्रेम-दान करने वाले श्रीकृष्ण ने विहार के लिये नवीन मनकी-दिव्य मनकी सृष्टि की। योगेश्वरेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की यही योगमाया है, जो रासलीला के लिये दिव्य स्थल, दिव्य सामग्री एंव दिव्य मनका निर्माण किया करती है। इतना होने पर भगवान की बाँसुरी बजती है।

भगवान की बाँसुरी जड़ को चेतन, चेतन को जड़, चल को अचल और अचल को चल, विक्षिप्त को समाधिस्थ और समाधिस्थ को विक्षिप्त बनाती ही रहती है।

भगवान का प्रेमदान प्राप्त करके गोपियाँ निस्संकल्प, निश्चिन्त होकर घर के काम में लगी हुई थीं। कोई गुरुजनों की सेवा-शुश्रूषा ‘धर्म’ के काम मे लगी हुई थी, कोई गो-दोहन आदि ‘अर्थ’ के काम में लगी हुई थी, कोई साज-श्रृंगार आदि ‘काम’ के साधन मे व्यस्त थी, कोई पूजा-पाठ आदि ‘मोक्ष’-साधन में लगी हुई थी। सब लगी हुई थीं अपने-अपने काम में, परंतु वास्तव में उनमें से एक भी पदार्थ वे चाहती न थीं। यही उनकी विशेषता थी और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि वंशीध्वनि सुनते ही कर्म की पूर्णता पर उनका ध्यान नहीं गया।
(साभार श्री राधामाघव से)

क्रमश

7

रासलीला रहस्य
भाग- 7

काम पूरा करके चलें ऐसा गोपियों ने नहीं सोचा। वे चल पड़ीं, उस विषयासक्ति-शून्य संन्यासी के समान, जिसका हृदय वैराग्य की प्रदीप्त ज्वाला से परिपूर्ण है। किसी ने किसी से पूछा नहीं, सलाह नहीं की अस्त-व्यस्त गति से जो जैसे थी, वैसे ही श्रीकृष्ण के पास पहुँच गयी। वैराग्य की पूर्णता और प्रेम की पूर्णता एक ही बात है, दो नहीं। गोपियाँ व्रज और श्रीकृष्ण के बीच में मूर्तिमान वैराग्य हैं या मूर्तिमान प्रेम, क्या इसका निर्णय कोई कर सकता है?

साधना के दो भेद हैं- -
•मर्यादापूर्ण वैध साधना और
•मर्यादारहित अवैध प्रेमसाधना।

दोनों के ही अपने-अपने स्वतन्त्र नियम हैं। वैध साधना में जैसे नियमों के बन्धन का, सनातन पद्धति का, कर्तव्यों का और विविध पालनीय धर्मों का त्याग साधन से भ्रष्ट करने वाला और महान हानिकर है, वैसे ही अवैध प्रेम साधना में इनका पालन कलंकरूप होता है।

यह बात नहीं कि इन सब आत्मोन्नति के साधनों को वह अवैध प्रेम साधना का साधक जान-बूझकर छोड़ देता है। बात यह है कि वह स्तर ही ऐसा है, जहाँ इनकी आवश्यकता नहीं है। ये वहाँ अपने-आप वैसे ही छूट जाते हैं, जैसे नदी के पार पहुँच जाने पर स्वाभाविक ही नौका की सवारी छूट जाती है। जमीन पर न तो नौका पर बैठकर चलने का प्रश्न उठता है और न ऐसा चाहने या करने वाला बुद्धिमान ही माना जाता है। ये सब साधन वहीं तक रहते हैं, जहाँ तक सारी वृत्तियाँ सहज स्वेच्छा से सदा-सर्वदा एकमात्र भगवान की ओर दौड़ने नहीं लग जातीं।
(साभार श्री राधामाधव चिंतन से)

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...