रासलीला रहस्य
भाग- 3
भगवान के समान ही गोपियाँ भी परमरसमयी और सच्चिदानन्दमयी ही हैं। महारास में सम्मिलित गोपियाँ कोई साधारण नारियाँ नही, अपितु वेद की ऋचाऐं (वेद की एक लाख ऋचाऐं हैं जिनमें 80 हजार कर्मकांड, 16 हजार उपासना कांड और चार हजार ज्ञान कांड की हैं), दण्डक वन के ऋषि, आसुरी कन्यायें एवं प्रभु के वे भक्त जिन्होंने प्रभु की,कई कई जन्मों तक,युगों युगों तक कठिन अराधना कर गोपियों की देह प्राप्त की।
साधना की दृष्टि से भी उन्होंने न केवल जड़ शरीर का ही त्याग कर दिया है, बल्कि सूक्ष्मशरीर से प्राप्त होने वाले स्वर्ग, कैवल्य से अनुभव होने वाले मोक्ष और तो क्या, जड़ता की दृष्टि का ही त्याग कर दिया है। उनकी दृष्टि में केवल चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण हैं, उनके हृदय में श्रीकृष्ण को तृप्त करने वाला प्रेमामृत है। उनकी इस अलौकिक स्थिति में स्थूल शरीर, उसकी स्मृति और उसके सम्बन्ध से होने वाले अंग-संग की कल्पना किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती। ऐसी कल्पना तो केवल देहात्मबुद्धि से जकड़े हुए जीवों की ही होती है। जिन्होंने गोपियों को पहचाना है, उन्होंने गोपियों की चरणधूलि का स्पर्श प्राप्त करके अपनी कृतकृत्यता चाही है।
ब्रह्मा, शंकर, उद्धव और अर्जुन ने गोपियों की उपासना करके भगवान के चरणों में वैसे प्रेम का वरदान प्राप्त किया है या प्राप्त करने की अभिलाषा की है। उन गोपियों के दिव्य भाव को साधारण स्त्री-पुरुष के भाव जैसा मानना गोपियों के प्रति, भगवन् के प्रति और वास्तव में सत्य के प्रति महान अन्याय एंव अपराध है। इस अपराध से बचने के लिये भगवान की दिव्य लीलाओं पर विचार करते समय उनकी अप्राकृत दिव्यता का स्मरण रखना परमावश्यक है।
भगवान का चिदानन्दघन शरीर दिव्य है। वह अजन्ता और अविनाशी है, हानोपादानरहित है। वह नित्य सनातन शुद्ध भगवत्स्वरूप हैं।
(साभार श्री राधामाधव चिंतन से)
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