चीरहरण रहस्य- भाग 3
श्रीकृष्ण चराचर प्रकृति के एकमात्र अधीश्वर हैं समस्त क्रियाओं के कर्ता, भोक्ता और साक्षी भी वे ही हैं। ऐसा एक भी व्यक्त या अव्यक्त पदार्थ नहीं है, जो बिना किसी परदे के उनके सामने न हो। वे ही सर्वव्यापक, अन्तर्यामी हैं। गोपियों के, गोपों के और निखिल विश्व के वे ही आत्मा हैं। उन्हें स्वामी, गुरु, पिता, माता, सखा, पति आदि के रूप में मानकर लोग उन्हीं की उपासना करते हैं।
गोपियाँ उन्हीं भगवान को, यह जानते हुए कि ये ही भगवान हैं- ये ही योगेश्वरेश्वर, क्षराक्षरातीत पुरुषोत्तम हैं,पति रूप मे प्राप्त करना चाहती थीं। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध का श्रद्धाभाव से पाठ कर जाने पर यह बात बहुत ही स्पष्ट हो जाती है कि गोपियाँ श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को जानती थीं, पहचानती थीं। वेणुगीत, गोपीगीत, युगलगीत और श्रीकृष्ण के अन्तर्धान हो जाने पर गोपियों के अन्वेषण में यह बात कोई भी देख सुन समझ सकता है। जो लोग भगवान को भगवान मानते हैं, उनसे सम्बन्ध रखते हैं, स्वामी-सुहृद् आदि के रूप में उन्हें मानते हैं, उनके हृदय में गोपियों के इस लोकोत्तर माधुर्य सम्बन्ध और उसकी साधना के प्रति शंका ही कैसे हो सकती है।
गोपियों की इस दिव्य लीला का जीवन उच्च श्रेगी के साधक के लिये आदर्श जीवन है। श्रीकृष्ण जीव के एकमात्र प्राप्तव्य साक्षात परमात्मा हैं। हमारी बुद्धि, हमारी दृष्टि देह तक ही सीमित है। इसलिये हम श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रेम को भी केवल दैहिक तथा कामनाकलुषित समझ बैठते हैं। उस अपार्थिव और अप्राकृत लीला को इस प्रकृति के राज्य में घसीट लाना हमारी स्थूल वासनाओं का हानिकर परिणाम है। जीव का मन भोगाभिमुख वासनाओं से और तमोगुणी प्रवृत्तियों से अभिभूत रहता है। वह विषयों में ही इधर-से-उधर भटकता रहता है और अनेकों प्रकार के रोग-शोक से आक्रान्त रहता है।
जब कभी पुण्यकर्मों का फल उदय होने पर भगवान की अचिन्त्य अहैतु की कृपा से विचार का उदय होता है, तब जीव दुःख ज्वाला से त्राण पाने के लिये और अपने प्राणों को शान्तिमय धाम में पहुँचाने के लिये उत्सुक हो उठता है।वह भगवान के लीला धामों की यात्रा करता है, सत्संग प्राप्त करता है और उसके हृदय की छटपटी उस आकांक्षा को लेकर, जो अब तक सुप्त थी, जगकर बड़े वेग से परमात्मा की ओर चल पड़ती है।
(साभार श्री राधामाधव चिंतन से)
क्रमश:
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